बुधवार, 6 अप्रैल 2016

सबसे बड़ा लोकतंत्र - बेमतलब का!



वोट हमारा अधिकार है- जरूर दें वोट – आजादी के बाद से हमें ऐसे अधिकार वाले नारे हमें खूब सुनाए जाते हैं – लोकतंत्र का हवाला दिया जाता है – सबसे बड़े लोकतंत्र का दंभ भरा जाता है – दरअसल इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम आदमी के हक में कुछ है ही नहीं। आप पूछेंगे वह कौन सी व्यवस्था है जो आम आदमी के हित में है तो यह सोचने का अधिकार आपका भी है। बस मैं यही देख रहा हूँ इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम आदमी के लिए कुछ नहीं है। राजनीतिक पार्टियां, उसके नेता, सत्ता में आने के बाद उनके मंत्री हमें बेवकूफ बनाते हैं। चुनाव के दौरान बड़ी बड़ी घोषणाएं होती हैं। दावा किया जाता है कि अगले पांच साल में उन्हें पूरा कर दिया जाएगा।

अंग्रेजों से भारत को हथियाने के बाद से हमारे नेताओं ने पहले चुनाव में भी वही वायदे किए थे जो आज के नेता आज के चुनाव में कर रहे हैं। सड़क, बिजली, पानी, गरीबी, स्वास्थ्य – क्या आजादी के इतने सालों बाद भी पूरे नहीं हो जाने चाहिए थे?
खैर छोड़िये आप बताएं वोट दे आने के बाद आपको क्या मिलता है? क्या वो नेता आपको दुबारा मिलता है जिसे आप वोट देकर आए हैं? क्या थाने में आपकी रिपोर्ट आसानी से लिख दी जाती है? क्या अस्पताल में जाने पर आपका इलाज हो जाता है? डॉक्टर उपलब्ध होते है? दवाइयां मिल जाती हैं? खैर छोड़िये ये बताइये आपके बच्चे का एडमिशन आप जिस स्कूल में चाहते हैं आसानी से हो जाता है? क्या सरकारी स्कूल में पढ़ाई का वह स्तर है जहां पढ़कर आपका बच्चा किसी काम का हो पाएगा? आप प्राइवेट स्कूल में दाखिला करा पाएंगे ? बिल्कुल नहीं – फीस देना आपके बस की बात नहीं है।

किसी दफ्तर में जाते हैं तो आपका काम आसानी से बिना घूस दिए हो जाता है? पढ़-लिख लेने के बाद नौकरी कहाँ हैं? क्या आपकी योग्यता क्षमता के अनुसार नौकरी है? क्या नौकरी खोजने के दौरान नेताओं के दलाल आपसे नौकरी दिला देने के एवज में रिश्वत की माँग नहीं करते?
देश की एक बड़ी आबादी आज भी भूखे सोने को मजबूर है, आदिवासियों के संशाधनों पर सरकार और पूँजीपतियों का कब्जा है, किसान खुदकुशी कर रहा है, युवाओं को जाति-धर्म के नाम पर लड़ाया जा रहा है क्या यही है लोकतंत्र? कहा तो जाता है कि यह जतना द्वारा जनता पर जनता का शासन है- इससे बड़ा कोई झूठ है क्या? वोट दे देने के बाद आपके हिस्से कुछ बचता है क्या?
यह एक ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था है जिसमें हम संवैधानिक रूप से गुलाम हैं।



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