मंगलवार, 18 जनवरी 2011

मीडिया का साम्प्रदायिक ‘चरित्र’

2008 में जब मुंबई पर हमला हुआ तो सवाल उठा कि आखिर खुफिया एजेंसियों को इसकी भनक तक क्यों नहीं लगी? कुछ जानकारों ने इसका एक जवाब भी ढूढ़ा कि खुफिया एजेंसियों में मुस्लिम चेहेरे तो हैं ही नहीं। अर्थात् इन एजेंसियों में किसी बड़े पद पर कोई मुस्लिम अफसर नहीं है। कहने का तात्पर्य यही था कि हम जिस धर्म या जाति से सम्बंधित होते हैं उसके बारे में बाकी के मुकाबले ज्यादा जानते हैं। हम कार्रवाई करना चाहें तो कर सकते हैं बचाना चाहें तो बचा सकते हैं। बहुत कुछ यही भाव था मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस में धमाकों के बाद। जो भी आतंकवादी घटना होती-मुस्लिम युवक को पकड़ कर खानापूर्ति कर दी जाती। असीमानंद के स्वीकारने के बाद तस्वीर एकदम बदल गई। मीडिया में भी ये साम्प्रदायिक भाव बहुत गहरे है...एक वाक्या याद आ रहा है....

आउटपुट हेड ने कहा-सुदर्शन जी की प्रेस कॉन्फ्रेंस चल रही है सीधे लाइव काटिये।

सर् अभी तो कार्यक्रम चल रहा है-अन्य सीनियर ने जवाब दिया।

कार्यक्रम रोकिए सीधे लाइव काटिए-आउटपुट हेड फिर बोले

सर् सुदर्शन जी का डेजिगनेशन क्या लिखें? क्योंकि वो आरएसएस के प्रमुख तो है नहीं।

आपको बताना पड़ेगा। लिखिए ना अध्यक्ष आऱएसएस अरे नहीं पूर्व सरसंघचालक लिखिए।

ठीक है सर्। लेकिन सर् हेडर क्या दूं। सुदर्शन की प्रेस कॉन्फ्रेंस या आरएसएस की प्रेस कॉन्फ्रेंस

अरे सुदर्शन आरएसएस की ओर से ही प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे होंगे।

निश्चय हुआ कि आरएसएस की प्रेस कॉन्फ्रेंस लिखेंगे और उनका डेजिगनेशन आरएसएस के पूर्व सरसंघचालक।

लाइव कटा। केसी सुदर्शन का चक्र चला।

सुदर्शन के आधे घंटे की प्रेस कॉन्फ्रेंस का निहितार्थ यही था कि भाजपा, आरएसएस और वीएचपी के बड़े नेता और हजारों समर्थकों के साथ उस वक्त अयोध्या में थे लेकिन विवादित ढांचा गिराने का मकसद नहीं था। यदि विवादित ढांचा गिरा तो इसमें केंद्र की सरकार के अहम योगदान को नकारा नहीं जा सकता।

लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट पर सुदर्शन जी बोले-रिपोर्ट में अटल बिहारी वाजपेयी का नाम आना दुखद है।

मिश्रा जी ने थोड़ा उत्साह दिखाते हुए सुदर्शन की प्रेस कॉन्फ्रेंस की जगह बाबरी मस्जिद लिख दिया।

एक सीनियर मनोरंजन जी चीखते हुए बोले-आपने बाबरी मस्जिद क्यों लिख दिया। जब आप ही बाबरी मस्जिद लिख देंगे तो लोग तो समझेंगे ना कि वहां बाबरी मस्जिद थी। फिर चीखे...हेडर हटाइए। लिखिए- विवादित ढांचा ।

पीछे से आउटपुट हेड ने भी डांटा-आगे से बाबरी मस्जिद कभी नहीं लिखेंगे। सर् बाकी चैनलों ने भी लिखा था सो....। बाकी को लिखने दीजिए-उनका कोई चरित्र है क्या?

एक सीनियर ने कहा-सर् हम लोग कितने बायस हैं।

मनोरंजन जी फिर बोले-बायस नहीं हैं। आप सोचिए अगर मंदिर गिराया गया लिख दें तो सड़क से संसद तक हंगामा बरप जाएगा। मंदिर कैसे लिख दिया। जबकि राम मंदिर वहीं था। वही गिरा था और वहां मंदिर ही बनना चाहिए।

मंदिर वहीं बनना चाहिए पर आउटपुड हेड की कातिल मुस्कान साफ-साफ झलक रही थी।

मनोरंजन एक कट्टर हिंदुवादी हैं। समय-समय पर अपना चारित्रिक परिचय देते रहते हैं।

सुदर्शन की प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म होने वाली थी। बुलेटिन में थोड़ा समय बचा था। शिफ्ट इंचार्ज ने कहा कि प्रेस कॉन्फ्रेंस जैसे ही खत्म हो। कल्याण सिंह की बाइट कट गई है उसे चलाइए। तीन चार बाइट है। अच्छा बोले हैं।

सुदर्शन की प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म। कल्याण की बाइट-

ढांचा गिर गया तो गिर गया। हमें ढांचा गिरने का गम नहीं। लेकिन अब वहां मंदिर ही बनेगा, मंदिर ही बनेगा, मंदिर ही बनेगा। वहां मंदिर बनने से दुनिया की कोई ताकत रोक नहीं सकती।

आउटपुट हेड ने कहा-अच्छा तो बोल रहे हैं एक दो बाइट और हो तो चलाइओ।

करीब एक घंटे के टेलीविजन बुलेटिन में सुदर्शन और कल्याण सिंह की भड़ास चलती रही।

राष्ट्रीय चरित्र का चोंगा ओढ़े ज्यादातर न्यूज चैनलों का यही असली चरित्र है। इनके मौकापरस्ती की दाद देनी होगी। संतुलित और निष्पक्ष खबरों की उम्मीद करने की स्थिति नहीं है। हां इतना कहना ज्यादा जरूरी है कि इन्हें देखकर अपना व्यू कत्तई न बनाएं। अपने ज्ञान और सामयिक परिप्रेक्ष्य में इन्हें परखते जरूर रहें।

सोमवार, 3 जनवरी 2011

‘लाल’ का काला सच





मुझे याद है कुछ साल पहले बिहार के किसी जिले से खबर आई थी कि पुलिस ने एक नक्सली को हथियारों के साथ पकड़ा है। पुलिस की गिरफ्त में आया नक्सली मीडिया को बता रहा था-अमीर लोग गरीबों का शोषण करते हैं, पुलिस वाले अमीरों की मदद करते हैं। सरकार के पास गरीबों के लिए कोई हमदर्दी नहीं है। नियम और कानून सब गरीब लोगों के लिए है। ये दुनिया पैसे वालों की है। बलि का बकरा हमेशा गरीब बनता है–ऐसी ही बहुत की सी बातें उस नक्सली ने कही। उसकी बात से मैं पूरी तरह सहमत हुआ औऱ कई दिन तक इस मुद्दे पर लोगों से बहस करता रहा है कि नक्सलियों की लड़ाई सही है और हम सब को उनका साथ देना चाहिए। मैंने सोचा आखिर कौन नहीं चाहता है कि समाज में समरसता की भावना कायम हो। हरेक को अपने

अधिकारों के साथ जीने का हक मिले। सोचने और जीने की आजादी मिले।

अगर आप आम इंसान हैं तो सोचिये हर दिन जिंदगी जीने के लिए कितनी जद्दोजहद करनी पड़ती है। बिना घूस दिये कोई काम नहीं होता। छोटे दफ्तर के बाबू से लेकर बड़े दफ्तर के अफसर तक घूस लेते हैं। बिना इलाज के हजारों लोग रोज बेमौत मारे जाते हैं क्योंकि पर्याप्त इलाज के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं अगर हैं तो कुछ लोगों के लिए। उद्योग धंधों में लगे मजदूरों को जबरदस्त तरीके से शोषण होता है। समय पर वेतन नहीं दिया जाता। शिक्षा के नाम पर सरकारी प्रचार प्रसार भोथरे साबित हो रहे हैं। प्राइमरी स्कूलों में पैसे वालों के बच्चे अब नहीं पढ़ते। वहीं लोग जाते हैं जो गरीब हैं-वो भी पढ़ाई के लिए नहीं बल्कि मिडडे मील के लिए। आखिर खाएंगे नहीं तो जीएंगे कैसे। यदि इन्हीं सब विसंगतियों और विडंबनाओं के बीच कोई रास्ता सूझता है कि समाज की गैरबराबरी को कम करने के लिए कुछ किया जाए तो मुझे उस नक्सली की सोच ठीक लगती है। मैं ही क्या देश के तमाम लोग उसका समर्थन करेंगे।

धीरे-धीरे जैसे मैं बड़ा होता गया नक्सली गतिविधियों को अपनी आंखों से देखता गया-मुझे वितृष्णा होने लगी। नक्सली ग्रामीणों की हत्या करने लगे, ग्रामीण इलाकों के स्कूलों को तबाह करने लगे। ट्रेनों में लूटपाट करने लगे और अब जो सबसे घिनौनी तस्वीर मेरे सामने आई कि नक्सली आदिवासी महिलाओं को अगवा कर उनका शौन शोषण करते हैं। एक दो नहीं बल्कि हर साल सैकड़ों महिलाएं उनका शिकार होती हैं। आदिवासी हैं, अशिक्षित हैं, गरीब हैं- अत: उन्हें ये समझ नहीं कि उनके गर्भ में जो बच्चा है उसका करें क्या? ऐसी बिन ब्याही मांएं अपने नवजात बच्चों को जंगलों-झाड़ियों में फेंक देती हैं। ये आदिवासी महिलाएं नक्सलियों के हवस का शिकार बन रही हैं। इस कहानी को मुझे कोई और सुनाता तो शायद मैं विश्वास नहीं करता और उल्टे जवाब देता कि आप लोग नक्सलियों की छवि को बिगाड़ना चाहते हैं। लेकिन जब ये हकीकत खुद देखी औऱ सुनी तो पैर के नीचे से जमीन खिसक गई। रांची में एक समाजसेवी संस्था नक्सलियों की शिकार आदिवासी महिलाओं और उनके बच्चों को अपने पास रखती है। इनमें कई बच्चे तो आसपास के जंगली इलाकों लावारिस हालत में थे- उठाकर लाए गए।

ये सब देख सुनकर चिंता इस बात की हुई कि अब भरोसा किसपर करें?


रविवार, 2 जनवरी 2011

नया साल है, कुछ नया करो !

पिता जी चाहते थे कि मैं डॉक्टर बनूं । ग्रामीण परिवेश से आने वाले ज्यादातर लोगों के मां-बाप यही सोचते हैं। आप क्या करना चाहते हैं यह कोई नहीं पूछता। आपको बड़े होकर क्या बनना है आपके गार्जियन निर्णय लेते हैं। यही मेरे साथ हुआ-साइंस पढ़ने के लिए दबाव डाला गया। हाईस्कूल, इंटरमीडियट किसी तरह पास कर पाया। पिता जी की नजर में निकम्मा हो गया था। मैं डॉक्टर बनने की हिम्मत हार चुका था लेकिन पिता जी को पूरा भरोसा था कि उनका बेटा डॉक्टर बन जाएगा। साल भर पैसा और समय बर्बाद करने के बाद पिता जी को लंबा सा लेटर लिखा जिसका निहितार्थ यही था कि –मैं डॉक्टर नहीं बन पाउंगा आप जबरदस्ती दबाव डाल रहे हैं। पिता जी को बुरा लगा। क्योंकि संस्कृति यही है कि मां-बाप की आज्ञा का पालन करो। मेरे लंबे पत्र के जवाब में पिता जी का छोटा सा जवाब आया-भाड़ में जाओ। जो मन में आये, करो। जब तक पढ़ोगे पैसा दे दूंगा। तब से लेकर खुद के विवेक का उपयोग करने लगा। शादी भी अपने निर्णय से की। करियर जो चुना -संतुष्ट हूं।

करियर के बाद संस्कार की बात करें-जब छोटा था-दादा-दादी, मम्मी-पापा सभी कहते थे कि सच बोलो। सही काम करो। स्कूल और कॉलेज में गया तो वहां भी इसी तरह के संस्कार देने की कोशिश की गई। बहुत कुछ यही संस्कार आज भी समाहित किए हुए आगे बढ़ रहा हूं। धूम्रपान नहीं करता। दिल्ली में करीब छह साल से रह रहा हूं शराब को हाथ नहीं लगाया। गुटखा-पान सुपाड़ी से कोसों दूर। ऑफिस में एक कर्मठ कर्मचारी की तरह काम करता हूं। ऑफिस में थोड़ा वक्त ज्यादा देना पड़े कोई गम नहीं लेकिन शिफ्ट पूरी होने के बाद काम की संतुष्टि मिले ऐसी कोशिश बराबर करता हूं। वक्त से पहले ऑफिस जाना और तय समय से थोड़ा देर से निकलना-जैसे आदत में शुमार हो गया है। हर आधे घंटे में सिगरेट पीने की आदत नहीं बनी है। एक-एक घंटे में चाय की चुस्कियां लेते हुए इधर की बात उधर करने की लत नहीं पड़ी। ऑफिस में कुछ अच्छे लोग भी हैं-जिन्हें सिर्फ मैं ही अच्छा नहीं कहता बल्कि सभी की नजर में वे अच्छे हैं-मुझे उनका बराबर प्यार मिलता है। मैं इसे अपनी उपलब्धि मानता हूं। अपनी नौकरी से संतुष्ट रहता हूं तो घर का माहौल अच्छा रहता है। रातों को अच्छी नींद आती है। परिवार में भी खुशमय माहौल बना रहता है।

गलत को सही कहना मेरे बस की बात नहीं। मेरे ज्ञान के दायरे में जो कुछ आता है-उस पर तर्क वितर्क कर लेता हूं। अन्यथा बड़ों से सलाह लेना ही उचित समझता हूं। कामचोरों से मेरी सबसे ज्यादा चिढ़ होती है। चापलूसों को बॉस के इर्द-गीर्द काले बादलों की तरह घुमड़ते देखने पर मेरा खून खौलता है।

दो साल तक ईमानदार और सश्रम नौकरी का रिजल्ट मेरे खिलाफ आया। आत्ममंथन किया तो जवाब मिला कि जिन चीजों की मैं खिलाफत करता था वही मेरे लिए घातक सिद्ध हुई। ऑफिस के एक सीनियर मेरे साथ जो हुआ देखकर दुखी थे। उन्होंने मुझे कुछ इन लफ्जों में समझाया- तुम ऑफिस में इतना काम क्यों करते हो? कौन देखता है तुम्हारा काम। तुमने भी आगे पीछे घूमकर झूठे कसीदे गढ़े होते तो आज तुम्हारी ये हालत नहीं होती। तुम लड़की नहीं हो इसलिए तुम्हें कुछ अलग करना होगा, जैसे-शराब की पार्टी दो, जिसमें कमसे कम बॉस जरूर शामिल हो। शराब ऐसी चीज है जो बॉस को भी एकहद तक गिरा सकती है। सर् को फोन कर उनके खिलाफ ऑफिस में चल रही गतिविधियों की जानकारी देते रहो। उन्हें ये आभाष दिलाते रहो कि आप उनके लिए कुछ भी कर सकते हो, जरूरत पड़ी तो थूक कर चाट भी सकते हो। आप उनके करीबियों में से एक बनने की कोशिश करो। काम में बुद्धू और बॉस की नजर में बुद्ध बने रहो। अगर ऐसा करने में सफल रहे तो बॉस जहां भी जाएगा, तुम्हें जरूर ले जाएगा। तरक्की निश्चित है। तुम काम कम राजानीति ज्यादा करो। काम कुछ भी करो, कान इधर-ऊधर लगाए रहो। नया साल है, कुछ नया करो । कुछ पाना है तो शुरू हो जाओ।