अभिनेत्री प्रत्यूषा
बैनर्जी की खुदकुशी के बाद सोशल माध्यमों, अखबारों और न्यूज चैनलों पर खूब लिखा और
दिखाया जा रहा है। अब तक कितनी अभिनेत्रियों ने खुदकुशी की उनकी कहानी बताई जा रही
है। खुदकुशियों की ये दास्तान सिर्फ अभिनेत्रियों तक सीमित नहीं है बल्कि समाज के
हर स्तर पर बिल्कुल उन्हीं वजहों के साथ मौजूद है।
अभिनेत्री रेखा वाले
मामलों को छोड़ दें तो अभी तक अभिनेताओं की बजाय ज्यादा अभिनेत्रियों ने खुदकुशी
की है। जो खुदकुशी नहीं कर पाईं वो अलग हैं - साथ साथ रहकर जी सकना उनके लिए
मुश्किल है। हम अभिनेत्रियों की बजाय लड़कियों की बात करते हैं जिसमें सब आ
जाएंगी। लड़कियां कमजोर नहीं होती हैं। उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से कमजोर करने की
साजिश सदियों पुरानी है कि - तुम कमजोर हो, तुम्हारी इज्जत चली गई तो सब चला गया,
तुम अपनी पहल पर किसी के साथ शारीरिक सम्बंध बनाने के बारे में सोच भी रही हो तो
अनर्थ है, तुम अपने साथ किसी पुरुष की कल्पना भी कर रही हो तो घातक है, तुम्हें
किसी पुरुष ने छोड़ दिया तो कमी तुम्हारे अंदर है, तुम्हे किसी पुरुष ने अपनी
विवाहिता बना लिया तो तुम्हारा सौभाग्य है, पुरुष चुनने का अधिकार तुम्हारा नहीं
है अगर ऐसा किया तो तुम बदचलन हो, तुम्हे किसी पुरुष ने चुन लिया तो तुम सौभाग्यशाली
हो यह एक प्रकार का मनौवैज्ञानिक गेम है-जो बहुत पुराना है। इसके ठीक उल्टे – यार फलां
के तो तीन तीन गर्ल फ्रेंड्स हैं साला खूब मजे कर रहा है, यार सुनते हो, फलानियां
के तीन-तीन बॉय फ्रेंड हैं, कभी उसके साथ घूमती है कभी उसके साथ ...ली ...डी है।
यार उसकी तो दूसरी शादी
हो रही है क्या किस्मत वाला है। दूसरी जो मिली वो भी क्या माल है। यार फलनियां की
दूसरी शादी हो रही है - ...ली, ...डी, चुड़ैल है एक पति से मन नहीं भरा तो दूसरी
शादी कर रही है। यार फलाँ जी का लड़का बहुत सुंदर है उसे तो कई मिल जाएंगी – यार
फलनियाँ सुंदर है उसके पीछे तो कई लड़के पीछे पड़े रहते हैं। ...ली, ...डी है।
पुरुष के प्रति उच्च विचार, स्त्री के प्रति निम्न विचार। एक का काम अच्छा, उच्च
कोटि का दूसरे का वही काम निम्न कोटि का।
स्त्री-पुरुष सम्बंधों
में शारीरिक सम्बंध का बड़ा रोल होता है। शारीरिक सम्बंध बन जाने के बाद लड़की
अथवा प्रेमिका असुरक्षित महसूस करती है। इस असुरक्षा को दूर करने के लिए वह विवाह
चाहती है। सुरक्षित हो जाना चाहती है ताकि कोई कहे ना कि फलनियां तो उसके साथ रह
रही है वो भी बिना शादी के अथवा फलनियां तो पहले उसके साथ रह रही थी?
सदियों पुराने मनोवैज्ञनिक साजिश की शिकार हो जाती है। समाज अंतत: उसे ही तो दोषी मानेगा। वहीं पुरुष अथवा प्रेमी जिसके
साथ वह रह रही थी – फलाँ के साथ पहले ये रह रही थी अब वो रह रही है – क्या मजे हैं
उसके। किस्मत लिखवा के लाया है। आपने देखा होगा कई स्त्रियां बदलने वाले पुरुष
अथवा अपने से काफी छोटी उम्र की लड़की से साथ रह रहे पुरुष के प्रति समाज का
नजरिया गलत नहीं होता बल्कि एक-दो पुरुष बदलने वाली स्त्रियों के प्रति समाज का
नजरिया गलत होता है उसे निन्न दृष्टि से देखा जाता है। एक का काम गलत नहीं होता
जबकि दूसरे का काम बिल्कुल गलत होता है। एक पुरुष पर स्त्री से शारीरिक सम्बंध
बनाने के बारे में सोच सकता है यह उसका अधिकार है - पर एक स्त्री ऐसा कतई नहीं सोच
सकती है। पुरुष वही काम करे तो समाज में वह रह सकता है स्त्री वही काम करे तो वह
वेश्या कहलाएगी उसका ठिकाना कहीं और बता दिया जाएगा।
उसी मनौवैज्ञनिक साजिश का नतीजा है कि रेप पीड़ित कोई स्त्री जीवन भर घुटघुट
कर जीने को मजबूर होती है जबकि आरोपी पर इसका कोई असर नहीं होता। ऐसा लगता है उस
स्त्री ने ही गलत किया हो।
स्त्री-पुरुष की सारी भावनाएं संवेदनाएं – अपेक्षाएं बिल्कुल समान होती हैं।
हाँ अभिव्यक्ति के प्रकटीकरण में अंतर होता है। स्त्री को खुलकर अपनी बात कहने का मौका
नहीं मिला –उनका खुलापन गंदा माना जाता है। वह स्त्री ज्यादा अच्छी मानी जाती है, ज्यादा संस्कारी मानी जाती है जो अपनी
सारी जरूरतों को गड्ढे में डालकर उस पर मिट्टी डाल ले।
प्रत्यूषा बैनर्जी अपने प्रेमी से विवाह चाहती थी परन्तु वह नहीं चाहता था।
उसका खुराक मिल चुका था। उसने दूसरी प्रेमिका बना ली थी। प्रत्यूषा अकेली पड़ गई
थी। इस अकेलेपन में वह ठगी महसूस कर रही थी। हमारे समाज का ऐसा ढांचा अभी कहाँ बना
है कि वह उसमें रहकर सारे दुखों को भुलाकर जी सके। वह तो हमें अलविदा कह गई पर सवाल कई छोड़
गई जिस पर हमें सोचना चाहिए।


