आज से बाहर साल पहले जब नौकरी की तलाश में इलाहाबाद से
दिल्ली आया तो मुखर्जीनगर में अपने कुछ इलाहाबादी दोस्तों के साथ रहने लगा। रोज
सुबह उठता और अपडेटेड बायोडेटा लेकर दफ्तर दफ्तर चक्कर लगाता। यही चला करीब दो साल
तक।
एक बार दिल्ली यूनिवर्सिटी के नॉर्थ कैम्पस से गुजर रहा था
तो सामने एक बड़ा सा होर्डिंग लगा था। यह होर्डिंग्स किसी एक कॉलेज के सामने नहीं
बल्कि कई कॉलेजों के सामने लगा था, लिखा था – “चलो कँडोम के साथ।“ जिस छोटे और पिछड़े
इलाके से दिल्ली आया था मेरे लिए तो यह अचंभित करने वाली बात थी। दिल्ली के बारे
में उल्टा सीधा विचार आया - यहां तो लड़के और लड़कियों को बिगाड़ा जा रहा है।
हमारी संस्कृति को भ्रष्ट किया जा रहा है। अरे कुछ सुविचार लिखे होते तो ठीक था पर
ये तो....। अच्छा शहर तो कतई नहीं है। वो
भी यूनिवर्सिटी के बाहर इतने बड़े-बड़े होर्डिंग पर लिखने की क्या जरूरत है? अस्पताल के बाहर लिख
देते तो कुछ ठीक था - कॉलेज के बाहर? – बाप रे बाप।
इन्हीं अधूरे और अधकचरे विचारों के साथ दिन दिन गुजरने लगा।
कल जब एक खबर आई तो सोचा क्यों ने इस पर कुछ लिखा जाए। खबर थी कि एक लड़का और एक
लड़की प्रेम करते थे। प्रेम इतना कि दोनों लिवइन में रहने लगे। देश विदेश भी घूम
आए। इतना तो पक्का है दोनों ‘कँडोम के साथ चले’ होंगे। कुछ दिन बीत जाने के बाद लड़की ने लड़के
से कहा – “मुझे, तुमसे शादी करनी है।“ लड़के ने कहा – “ये तो नहीं हो पाएगा। मेरे घर वाले तैयार नहीं
होगे।“ लड़की आहत थी। उसने सुसाइड कर लिया।
स्त्री-पुरुष के इस स्वाभाविक रिश्ते में आखिर क्या वजह है
कि लड़की कमजोर हो जाती है? अगर शारीरिक सम्बंध बनाना इज्जत का चले जाना है तो पुरुष तो
सबसे बेइज्जत इंसान हुआ? उपरवाले केस में लड़का न सिर्फ बेइज्जत इंसान है बल्कि एक धोखेबाज
और अपराधी भी है। फिर भी सुसाइड लड़की ने ही क्यों की? उसे क्यों लगने लगता है कि उसकी इज्जत चली गई।
उसका सबकुछ लुट गया। वह अब जीने के काबिल नहीं? लड़के पर तो कोई फर्क नहीं पड़ा। वह तो अपने परिवार के
भरोसे है कि अपने संस्कारी बेटे के लिए मम्मी-पापा एक संस्कारी बहू लाएंगे। अगर वह
सबसे बड़ी इज्जत है तो उसका ठेका लड़की ही क्यों उठाए?
दरअसल यह शदियों पुरानी पुरुषवादी सोच है जो औरतों पर इतनी
बार थोपी गई कि उनके हृदय के कोने कोने में काई की तरह चिपक गई है। सुसाइड पुरुष
भी करे तो मानें कि यह सचमुच इज्जत थी जो शारीरिक सम्बंध बना लेने क बाद चली गई पर
ऐसा नहीं है।
लड़का-लड़की जब बड़े होते हैं तो यह एक स्वाभाविक इच्छा है
जो दोनों के भीतर प्रकट होती है। इसे रोका नहीं जा सकता है। पिछले दिनों एक आलेख
पढ़ा जिसमें एक लेखिका ने हस्थमैथुन के बार में लिखा था। यह भी अपनी उस प्राकृतिक
इच्छा को पूर्ण करने का एक तरीका है। अब आता हूँ दिल्ली यूनिवर्सिटी के कॉलेज के
सामने लगे उस होर्डिंग्स पर जिस पर लिखा था – “चलो कँडोम के साथ।“ मुझे बाद में समझ
आया कि यह कहीं से भी गलत नहीं था। समाज चिंतकों को भी पता है यह एक ऐसी इच्छा है
जिसे रोका नहीं जा सकता। रोकने से और भी कई अनगिनत सामाजिक और शारीरिक व्याधियां
पैदा होंगी। बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, छोटी-छोटी बच्चियों से बलात्कार उन्हीं
सामाजिक बीमारियों में से एक है। पर यह हमारे समाज का एक ऐसा अछूत मुद्दा बना हुआ
है जिस पर कोई बहस नहीं करना चाहता। कोई रास्ता नहीं खोजना चाहता है। समस्याओं में
जीने की जैसे आदत सी बन गई हैं। हम सोच रहें कानून बना देने से ये समस्याओं खत्म
हो जाएंगी – कभी खत्म नहीं होंगी। सामाजिक बुराइयों का हल समाज में नया बदलाव लाकर
ही किया जा सकता है-कानून से नहीं।
आज भी हमारा समाज पुरुषमानसिकता से उबर नहीं पाया है। आज भी
औरतों की बुनियादी जरूरतों को समस्या के रूप में देखा जाता है। औरतों के मन में भी
इतना भर दिया गया है कि अगर उन्हें पीरियड्स आ रहें हैं तो यह एक समस्या है-छुपाना
है किसी को पता न चल जाए। अगर उन्हें यूरिन आ रही है तो ये यह एक समस्या है-रोके
रखना है जिक्र तक भी नहीं करना है – लोग क्या सोचेंगे? उनके भीतर सेक्स की
भावना पैदा होना भी एक समस्या है-सबसे बड़ा अपराध है-बोल भी मत देना किसी से-लोग क्या
सोचेंगे? ये समस्याएं आज भी उसी रूप में बनी हुई हैं। सेनेट्री
नैपकीन की सहज उपलब्धता नहीं होने के कारण हजारों महिलाएं अनगिनत बीमारियों से
ग्रसित होकर असमय दम तोड़ देती हैं। घर से निकलते समय पानी नहीं पीती हैं क्योंकि
यूरिन के लिए कहीं व्यवस्था नहीं है। एक बार किसी ने लिखा था कि वह मॉलों में
शापिंग करने नहीं बल्कि कई बार सिर्फ यूरिन के लिए जाती हैं। पानी न पीने से कई बीमारियों
की शिकार हो जाती हैं।
समय बदल रहा है जरूरत है उस बदलाव को स्वीकार करने और उसे परिष्कृत
करते हुए आगे बढ़ने की। वक्त है अपनी जरूरतों को अपने बूते जागरूकता और समझदारी से
पूरा करने की। आप न किसी का शिकार करें और ना शिकार हों बल्कि हर कदम आपसी सहमति
और सोच से आगे बढ़ाएं। देखना कभी सुसाइड करने की जरूरत न पड़ेगी। अपने आपको ठगा
हुआ महसूस करने की जरूरत न पड़ेगी।