
हमारे देश में समय-समय पर मीडिया पर अंकुश लगाने की बातें उठती रहती हैं। लेकिन इसका इससे बड़े अनुपात में विरोध मीडिया संस्थानओं की ओर से होता है। ऐसा लगता है उनपर थोड़ा सा भी अंकुश उनके अस्तित्व पर खतरा पैदा कर सकता है। कुछ लोग इस विवाद में बीच का रास्ता सुझाते हैं कि मीडिया पर अंकुश लगाना ठीक नहीं है बल्कि मीडिया को सेल्फ कंट्रोल करना चाहिए। यह मुद्दा बार-बार उठता है और बिना किसी नतीजे के खत्म हो जाता है।
अखबारों का
सर्कुलेशन तेजी से बढ़ा है पर एक बड़ी आबादी को तात्कालिक तौर पर उत्तेजित
और प्रभावित नहीं कर पाता। इसके विपरीत टेलीविजन अर्थात् टेलीविजन मीडिया अखबार से
कम पहुंच के बाद भी तात्कालिक प्रभाव-दुस्प्रभाव डालने में ज्यादा सक्षम है। इसलिए
किसी न्यूज चैनल पर चल रही खबर से लोग तत्काल अपना व्यू तैयार कर लेते हैं और
देखते ही देखते उसका प्रतिफल भी नजर आने लगता है।
मुझे लगता है
टेलीविजन मीडिया के वर्तमान दौर को अब भी शैशवाकाल मानकर उसे ऐसे ही चलते देने और
उसे खुद से सुधर जाने की छूट नहीं दी जानी चाहिए। टेलीविजन मीडिया में खबरें,
खबरों की भाषा, कन्टेंट, कन्टेस्ट में भारी गलतियां होने लगी हैं। ऐसी गलतियां कि
उस पर हर दिन मानहानि के दस मुकदमें दाखिल हो जाएं।
न्यूज चैनलों
पर कई बार ऐसी खबरें चलती हैं जिनका समाज के किसी भी वर्ग से कोई सरोकार नहीं होता
है। ये खबरें सिर्फ सस्ती लोकप्रियता हासिल करने हेतु दिखाई जाती हैं। भाषा को
लेकर ऐसी गलतियां होने लगी हैं कि उसे देखकर पूरी खबर का संदर्भ-प्रसंग ही बदल
जाए।
किसी ने आरोप
लगाया कि A ने
तीन सौ करोड़ का घोटाला किया है तो इस बाबत तथ्य जुटाने, उसे जांचने परखने की
बजाय-न्यूज चैनल्स पर खबर चलने लगती है कि देश का सबसे बड़ा घोटालेबाज ‘ए’।
एक महिला ने आरोप लगाया कि ‘B’ ने उसके साथ बलात्कार किया है। इस आरोप का बिना
किसी पड़ताल के, बिना कोई देर किए खबर चलने लगती है कि बलात्कारी निकला ‘B’। किसी दफ्तर के अधिकारी पर आरोप लगाया गया कि
उसने दफ्तर के किसी कर्मचारी से छेड़छाड़ की है तो बिना देर किये खबर चल जाती है
कि दफ्तर में दुश्कर्म। ठीक इसी तरह से किसी ब्लास्ट में जांच एजेंसियों
द्वारा संदिग्ध के पकड़े जाने पर भी न्यूज चैनलों में भारी गलतियां की जाती हैं।
उपरोक्त सभी
मामलों में नतीजा बिल्कुल उल्टा भी हो सकता है। हो सकता है A घोटालेबाज
ना हो, B बलात्कारी ना हो और दफ्तर में दुश्कर्म हुआ ही
ना हो बस फंसाने के लिए आरोप लगा दिए गए हों। परन्तु मीडिया कई मामलों में आरोपी
को ‘दोषी’ ठहरा देता है।
पत्रकारिता
में एक अच्छी बात है कि आप तथ्यों को सही-सही रख भी दें तो वही अर्थ निकलता है जो
मीडिया कहना चाह रहा होता है लेकिन तथ्यों को जुटाने-रखने-जांचने की जहमत कौन उठाए? खबरों
को परोसने की हड़बड़ी में ये सारी गड़बड़ी हो रही है।
ऐसी
परिस्थिति पैदा होने के बाद यदि कोई कहे कि मीडिया को सेल्फ कंट्रोल करना चाहिए तो
हास्यास्पद लगता है। क्योंकि मीडिया संस्थानों में काम कर रहे लोगों को इतनी समझ
होती तो ब्लंडर होता ही क्यों?
पत्रकारिता
पढ़े-लिखे-सामाजिक सरोकार रखने वाले लोगों का पेशा मना जाता है लेकिन आज
भाई-भतीजावाद, क्षेत्रवाद, चापलूसवाद, अज्ञानतावाद और मूर्खतावाद का दौर चल पड़ा
है।
मीडिया
द्वारा तैयार किए गए ऐसे माहौल में यदि कोई कहता है कि मीडिया पर अंकुश लगना चाहिए
तो इसमें गलत क्या है?