मंगलवार, 21 नवंबर 2017

पीड़ित महिलाओं के हिस्से की लड़ाई है ‘अ वुमन अलोन’



दिल्ली स्कूल ऑफ सोशल वर्क डिपार्टमेंट के सभागार में 20 नवंबर 2017 को अ वुमन अलोन’ नाटक का मंचन किया गया। यह नाटक 1997 के साहित्य के नोबल पुरस्कार विजेता इटैलियन नाटककार एवं अभिनेता डारियो फो द्वारा लिखा गया था। इस नाटक में एक स्त्री की पीड़ा को दर्शाया गया है। कहते हैं साहित्य समाज का आईना होता है और अच्छा साहित्य सीमाओं को लांघते हुए सबका सुख-दुख अपने में समेट लेता है। अब इटैलियन नाटकर के नाटक अ वुमन अलोन’ की प्रासंगिकता देखिए कि वह भारतीय समाज का रिफलेक्शन लगता है। इससे एक बात यह भी साबित होती है कि पूरी दुनिया में स्त्रियों को वह सम्मानजनक अधिकार आज भी नहीं मिल पाया हैजिसकी वे वास्तविक हकदार हैं।

पिछले 12 साल से रंगमंच के क्षेत्र में सक्रिय कलाकार शिल्पी मारवाह ने अ वुमन अलोननाटक के जरिये भ्रूण हत्याछेड़छाड़बलात्कारघरेलू हिंसा के खिलाफ महिलाओं को जागरूक करने का बीड़ा उठाया है। दिल्ली विश्वविद्यालय के ज्यादातर कॉलेजों में इस नाटक को वो खेल चुकी हैं और उनका यह अभियान पूरे एनसीआर में चल रहा है।  
अ वुमन अलोन’ एक ऐसी महिला की कहानी है जिसके सपने विवाह के बाद उड़ान नहीं भरते बल्कि घर की चारदीवारी में कैद होकर रह जाते हैं। पति दफ्तर जाता है पर उसे घर में कैद करके जाता है। उस पर शक करता है। बार-बार फोन करके घर में किसी की मौजूदगी भांपता है। घर आने पर उसे प्रताड़ित है। इन सबके बावजूद वह घर में बीमार पड़े देवर की देखभाल करती है। देवर भी मौका पाकर उससे छेड़छाड़ करता है। गर्भवती होने के बावजूद इन सब दबावों को झेलती है। तंग आकर कई बार खुदकुशी की भी कोशिश करती है पर गर्भ में बच्चे का ख्याल आते ही रुक जाती है। उसे डांस करने का शौक है। वह एक डांस टीचर के संपर्क में आती है। लेकिन डांस टीचर उसे प्रेमजाल में फंसा लेता हैउसे धोखा देता है। धीरेधीरे वह टूटती चली जाती है।


भ्रूण हत्याछेड़छाड़बलात्कार और घरेलू हिंसा भारतीय समाज का शर्मनाक हिस्सा बन गया है। महिलाएं सालों से इसे सहती आ रही हैं। समाज बदल रहा है कम से कम इतना हुआ है कि महिलाएं पढ़-लिख रही हैंजागरूक हो रही हैं और इनकी जागरूकता को धार देने के लिए शिल्पी मारवाह जैसी कलाकार दिन रात मेहनत कर रही हैं।
बलात्कार और घरेलू हिंसा जैसी समस्याओं पर जब बात होती है तो ऐसा लगता है कि पुरुष इसके जिम्मेदार हैं जबकि ऐसा नहीं है। भ्रूण हत्याबेटे की चाहत एवं दहेज से जुड़े ज्यादातर मामलों में महिला ही महिला के खिलाफ खड़ी रहती है। महिला सशक्तिकरण का मतलब पुरुष विरोधी नहीं बल्कि महिला भी अपनी सोच को आजाद कर सके – इसकी लड़ाई है।
दिल्ली स्कूल ऑफ सोशल वर्क डिपार्टमेंट के सहयोग से और सुखमंच थियेटर के बैनर तले खेले गए अ वुमन अलोन’ सोलो नाटक में हर बार की तरह इस बार भी शिल्पी मारवाह ने अभिनय कौशल से सबका मन मोह लिया। लोगों को समझदार बनाने का शिल्पी का यहदीवानापन’ लोगों को भी रास आ रहा है। शिल्पी का सफर जारी है...।


मंगलवार, 18 जुलाई 2017


गुरु की शिकायत!



किसी पर श्रद्धा प्रकट करते करते उसे पूजने लगना बड़ा घातक होता है। ऐसा करके हम न सिर्फ अपने सीखने के दरवाजे बंद कर लेते हैं बल्कि उसे भी खत्म कर देते हैं जो पूज्य है। जिनके प्रति मेरा निर्बाध प्रेम व अटूट श्रद्धा है उसकी शिकायतें बहुत हैं। मैं उसकी शिकायतें करूँगा।
पिछले दिनों जब मैं हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार विश्वनाथ त्रिपाठी जी के पास गया तो उन्होंने कवि व आलोचक राजेंद्र कुमार के संदर्भ में कई बातें कहीं। साथ-साथ इलाहाबाद में बिताये दिनों का जिक्र किया। यह भी बताया कि जब भी वे दिल्ली आते हैं मुझसे मिलने जरूर आते हैं। इन मुलाकातों का कई बार गवाह मैं भी बना हूँ। दोनों पुराने दिनों की यादों में खो जाते और फिर ठहाके लगाकर हँस पड़ते। मैं चुपचाप इस दृश्य ग्रंथ को देखता रहता। मुझे लगता जैसे कोई ज्ञान की गंगा बह रही हो और मैं उसमें डुबकी लगा रहा हूँ।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान जब मैं पहली बार राजेंद्र कुमार के लेक्चर सुना तो मुरीद हो गया। पढ़ाने व समझाने की अद्भुत कला। ऐसा लगा कि जैसे मुझे मेरा गुरु मिल गया हो। पर इतने बड़े व्यक्तित्व जिनकी कक्षाओं को प्रतियोगी छात्र भी चोरी छुपे रिस्क लेकर घुस जाते - काफी मना करने के बाद भी ढीठ की तरह खड़े रहकर भी उन्हें सुनने को तैयार रहते, ऐसे व्यक्तिव के पास जाने की भी मेरी हिम्मत नहीं थी। पर मेरे सीखने की ललक ने मुझे उनके पास तक पहुंचा दिया। आज जो मैं सामाजिक रूप से गढ़ा हुआ दिख रहा हूँ उसमें इस कारीगर का सबसे बड़ा रोल है। फिर क्या था इलाहाबाद की कई गोष्ठियों में शामिल होने हम दोनों साइकिल से चले जाते और लौट आते थे।
नौकरी की तलाश में जब दिल्ली आया तो राजेंद्र कुमार से करीब साल भर तक बातचीत नहीं हुई। बड़ा संकोच होता है संघर्षों के दौरान किसी से मिलना, उससे बात करना। चुपचाप हो गया था। सुबह नौकरी की तलाश में निकलना और कई बार बिना नींद आए पूरी रात गुजार देना। राजेंद्र कुमार ने बताया कि जब तुम्हारा फोन कई दिन तक नहीं आया तो मुझे लगा तुम भी वैसे ही हो गए होगे जैसा कि बहुत लोग नौकरी मिल जाने के बाद हो जाते हैं। लगा तुम्हें भी नौकरी मिल गई होगी और तुम अपने में व्यस्त हो गए होगे। पर अगले ही क्षण मुझे यह भी विचार आया कि कहीं तुम किसी परेशानी में तो नहीं, कहीं कोई दिक्कत तो नहीं?  राजेंद्र कुमार का फोन आया तो दूसरी वाली बात सच निकली। उनसे ही मैंने सीखा कि कभी भी एक पक्षीय मत सोचो। कई बार दूसरा पक्ष ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।
राजेंद्र कुमार जब भी दिल्ली आते होटलों, गेस्ट हाउसों को तिलांजिल देकर मेरे पास ही रुकते। उस समय मैं एक कमरे के मकान में रहता था। खुद रोटी सेंकता, सब्जी बनाता और फिर चाव से दोनों बैठकर खाते। जिस कार्यक्रम में उन्हें जाना होता उन्हें लेकर वहाँ जाता।
विश्वनाथ त्रिपाठी जी से मैने कहा कि जिस राजेंद्र कुमार की आप इतनी तारीफ कर रहे हैं मेरे पास उनकी शिकायत भी है। उन्होंने कहा- बताओ। मैंने कहा कि - कोई गुरु ऐसा हो सकता है क्या कि जब-जब राजेंद्र कुमार दिल्ली आए मुझे जरूर बताया पर जब वे एम्स में हफ्ते भर तक भर्ती रहे मुझे बताना भी उचित नहीं समझा, और जब मैंने उनसे पूछा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया तो उन्होंने कहा – “मैंने इसलिए नहीं बताया कि तुम परेशान होते।

शनिवार, 24 जून 2017

यादववाद के बाद ठाकुरवाद


इलाहाबाद के जार्ज टाउन थाने के पास से गुजर रहा था। थाने के भीतर से तेज आवाज आ रही थी। मुझे लगा हो सकता है कोई पुलिसवाला किसी आम आदमी पर रौब झाड़ रहा हो। पर भाषा पुलिस वाले की थी नहीं। पास पहुंचा तो देखा 30-35 साल का एक युवा थाना प्रभारी को खूब खरी-खोटी सुना रहा था। उसका ट्रांसफर और उसे नौकरी से बर्खास्त करा देने की धमकी दे रहा था। किसी को पकड़ने और उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का निर्देश दे रहा था। उल्टी गंगा बह रही थी। जब वह युवक चला गया तो पता चला कि वह कोई फलाँ ठाकुर थे-सिंह साहेब थे।
मुझे इसके पीछे की कहानी समझने में देर ना लगी। यूपी में सबकुछ वैसे ही चल रहा है जैसा पिछली अखिलेश यादव सरकार में था। पहले यादव सरकार थी अब ठाकुर सरकार है। पहले हर यादव खुद को अखिलेश यादव का रिश्तेदार समझता था-गुँडई करता था। लोग कहने लगे हैं कि अब वह सबकुछ ठाकुर कर रहे हैं।
मुख्यमंत्री जी भले ही अपना नाम योगी आदित्यनाथ लिखते हों पर धीरे धीरे पब्लिक जान गई है कि वह ठाकुर साहेब हैं-सिंह साहेब हैं-राजपूत जी हैं। फिर क्या जिस प्रकार एक समय यादवों में गुरूर का भाव आ गया था ठीक उसी प्रकार अब ठाकुरों में वही भार भर गया है। भाव ऐसे नहीं भरता। सरकार की गतिविधियां इस बात का संकेत दे देती हैं कि वह किस दिशा में चल रही है।
जब यूपी सरकार जीत के गर्भ में थी तो मनोज सिन्हा का नाम यूपी के मुख्यमंत्री की रेस में सबसे आगे था। उस समय प्रदेश का भूमिहार अपने उत्थान के सपने देखने लगा था। दूसरे शब्दों में कहूँ तो उसके भीतर भी वही गुरूर भरने लगा था जो कभी यादवों में था, अब ठाकुरों में है। मनोज सिन्हा मुख्यमंत्री बनते तो वही भाव भूमिहारों में भी गहराई से भर जाता इसमें कोई संदेह नहीं है। इन घटनाओं से एक बात तो साफ है कि प्रदेश जातिवाद में आकंठ डूबा हुआ है। हर जाति शिकार की तलाश में बैठी है।
मुझे यह नहीं पता कि सरकार बनने के बाद उच्च पादसीन व्यक्ति अपनी जाति के लोगों को बिगड़ैल बन जाने का निर्देश देता है या नहीं पर जातियां स्वंयभू तरीके से पशुवत जरूर बन जाती हैं। इस तरह के सवाल पत्रकारों द्वारा अखिलेश यादव से भी कभी पूछते नहीं सुना और अब योगी सरकार में भी किसी पत्रकार के पूछने की उम्मीद नहीं है। जो बीजेपी सर्वधर्म समभाव एवं वशुधैव कुटुम्बकम की बात करती रही है परिणाम बता रहे हैं कि वह भी कितनी संकुचित सोच की कितनी धनी है।    


सोमवार, 29 मई 2017

विवाह की भी एक मियाद हो!
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विनोद खन्ना जी नहीं रहे-किसी को भी नहीं रहना है। एक न एक दिन जाना ही है। खबरों में पढ़ते हुए पता चला कि विनोद खन्ना जी अपनी पहली पत्नी गीतांजलि से दो बच्चों के बाद अलग हो गए थे। लोग कहते हैं उन्होंने ऐसा ओशो के संसर्ग में आने के बाद किया था। पांच साल बाद जब ओशो-आश्रम से वापस आए तो उन्होंने कविता से दूसरी शादी की। गीतांजलि और कविता दोनों से दो-दो बच्चे हैं।
जब हम ओशो को दोष देते हैं कि उनकी की वजह से विनोद खन्ना अपनी पहली पत्नी गीतांजलि से अलग हुए थे या गीतांजलि ने विनोद खन्ना को छोड़ा था- तो हमारा ध्यान ओशो के उस विचार की तरफ बरबस जाता है जब उन्होंने विवाह जैसी व्यवस्था पर सवाल उठाया था। उसे अनैतिक और बंधन वाला बताया था। कुछ लोग उनके इस विचार को उछृंखलता से जोड़कर देखते हैं। मतलब कि शादी करने की जरूरत ही क्या है। बिना विवाह के रहो।
अभी इस तरह की व्यवस्था बननी बाकी है कि स्त्री-पुरुष का वास्तविक रिश्ता क्या हो-उसका सामाजिक स्वरूप क्या हो? – उसका सामाजिक ढांचा क्या हो? ये मत सोचियेगा कि विवाह व्यवस्था सदियों से चली आ रही है। यह भी एक व्यवस्था की घुटन के बाद उपजी दूसरी व्यवस्था है। यह सार्वभौमिक सच नहीं है। मतलब की विवाह जैसी सार्वकालिक लगने वाली व्यवस्था भी घुटन पैदा कर रही है। तलाक के मामले बढ़ रहे हैं। विवाह के बाद परिवार में कलह बढ़ रहे हैं।
अपने प्रिय लेखक राजकिशोर जी का एक आलेख आज पढ़ रहा था जिसमें उन्होंने एक सुझाव दिया है कि क्यों न विवाह की भी एक मियाद तय हो? मतलब की सात साल बाद विवाह का बंधन अपने आप समाप्त हो जाए - अगर पति-पत्नी फिर भी साथ रहना चाहें तो एक समझौते के तहत इस मियाद को आगे बढ़ा सकते हैं। अगर दोनों को बच्चों की आवश्यकता है तो शादी की यह मियाद 20 साल की हो। विवाह के बाद वाली घुटन से निपटने का यह एक हल हो सकता है। सार्वभौमिक सच नहीं। इस बादलाव के बाद भी घुटन होगी ही फिर बदलाव की मांग होगी। यह परिवर्तन चलता रहेगा।    


शनिवार, 20 मई 2017

अपनी-अपनी स्माईल!

अग्रवाल किराना स्टोर वाले गौरव से मैंने पूछा तुम्हारे जीवन का क्या उद्देश्य है?  हँसमुख-सभ्य गौरव ने जवाब दिया-स्माईल।हमने सोचा ये क्या बोल रहा है-यहाँ तो लोग अपने जीवन की एक लंबी लिस्ट बनाकर रखते हैं और ये कह रहा है स्माईल? उसने और क्लियर किया- भैया जी स्माईल दूसरों के चेहरे पर। अगर मेरे व्यवहार से सामने वाले का चेहरा खिल जाता है तो मेरे लिए यह सबसे बड़ी खुशी है। मेरे जीवन का यही उद्देश्य है। अच्छी बातें और जीवन जीने की कला सिर्फ डेल कारनेगी की किताबों में नहीं मिलती पर हम इतने गुमान में होते हैं कि खुद को बंद करके रखते हैं। कहीं से कोई विचार हमारे भीतर घुस भी न जाए। और ये दुकान वाला ये हमें क्या सिखाएगा जीवन जीने की कला? दरअसल गौरव की बात में जीवन का असल अर्थ छुपा है।
परिवार और कुछ रिश्तेदार मॉल में घूमने गए थे। मुझसे कहा गया अगर आपको नहीं चलना है तो कम से कम चार पांच घंटे बाद हमें लेने चले आना। रात करीब 10 बजे तय समय और मुकाम पर पहुंच गया। मॉल वाले AC में मस्त और बाहर ढेर सारे आने जाने वाले लोग गर्मी और उमस से पस्त। कार पार्क करके AC चलाकर, लैटेस्ट गाने लगाकर बहुत से लोग सड़क के किनारे खड़े थे। मैं भी उन्हीं जैसा उन्ही की तरह कतार में खड़ा हो गया। दूर चौराहे पर हमारी सुरक्षा में पुलिस के दो जवान किनारे पड़ी ईंट पर बैठे थे। न तो वो मॉल मे थे और न ही कार में थे। गर्मी में उन्हें भी सता रही थी। पसीने पोछे जा रहे थे। कार से उतरा मेरे पास ठंडा एक बॉटल पानी था उन्हें कुछ अजीब सा ना लगे इसलिए उनके सामने खड़े होकर पहले दो घूंट पीया फिर बॉटल उनकी तरफ बढ़ाते हुए कहा – प्यास तो आपको भी लगी होगी ना।उन्होंने हामी भरी और बॉटल अपने हाथ में लेकर जीभर पीया।
जब तक उनसे बात करता परिवार और रिश्तेदार भी मॉल से बाहर आ गए। उन्होंने जी भर के शॉपिंग की थी। सब खुश थे उनके चेहरे पर स्माईल थी।
पड़ोस वाले मिश्रा जी और उनके बगल वाले गुप्ता जी भी खुश रहते हैं। मैंने कई बार उनके चेहरे पर स्माईल देखी है। उनके बच्चे भी खुश रहते हैं। अच्छे कपड़े पहनते हैं। घर गाड़ी सबकुछ तो है उनका अपना। उनके चेहरे पर स्माईल हो भी क्यों ना। बच्चे जो चाहते हैं उनको देकर खुशी मिलती है। पत्नी भी खुश रोज नई नई साड़ी पहनने को मिलती है। मिश्रा जी खुद महँगी घड़ी पहनते हैं इसकी स्माईल उनके चेहरे पर साफ झलकती है। इन दोनों परिवारों के चेहरे पर सबसे ज्यादा स्माईल तब देखता हूँ- जब सप्ताह के आखिर में एक दिन सिविल लाइन्स के पास वाले होटल और कटरा चौराहे वाले रेस्टोरेंट से डिनर करके आते हैं। आखिर स्माईल के लिए ही तो कमा रहे हैं।
अभी अभी याद आया मिसेज यादव भी सिंगापुर गई हैं। वो भी डॉक्टर हैं और उनके पति भी डॉक्टर। दो बच्चे। दोनों खुश। बड़े स्कूल में पढ़ते हैं। कहा जाता है पूरे क्षेत्र के सबसे बड़े डॉक्टर हैं। उनके पास काफी बड़े बड़े लोग आते हैं। बड़े डॉक्टर हैं इसलिए बड़ी फीस है। ये डॉक्टर दम्पति अपनी स्माईल के लिए कोई समझौता नहीं करता। फिक्स है विंटर वकैशन हो या समर - सपरिवार विदेश तो जाना ही है। मुझे लगता है अभी तो आधी उमर है एक तिहाई होते होते दुनिया का एक बड़ा हिस्सा नाप चुके होंगे। अभी जब उन्होंने बड़ी गाड़ी खरीदी थी तो मुझसे मिले थे उनके चेहरे पर स्माईल थी। घर तो उन्होंने दो साल पहले ही खरीद लिया था।


चलो कँडोम के साथ!

                                                                                           
आज से बाहर साल पहले जब नौकरी की तलाश में इलाहाबाद से दिल्ली आया तो मुखर्जीनगर में अपने कुछ इलाहाबादी दोस्तों के साथ रहने लगा। रोज सुबह उठता और अपडेटेड बायोडेटा लेकर दफ्तर दफ्तर चक्कर लगाता। यही चला करीब दो साल तक।
एक बार दिल्ली यूनिवर्सिटी के नॉर्थ कैम्पस से गुजर रहा था तो सामने एक बड़ा सा होर्डिंग लगा था। यह होर्डिंग्स किसी एक कॉलेज के सामने नहीं बल्कि कई कॉलेजों के सामने लगा था, लिखा था – चलो कँडोम के साथ। जिस छोटे और पिछड़े इलाके से दिल्ली आया था मेरे लिए तो यह अचंभित करने वाली बात थी। दिल्ली के बारे में उल्टा सीधा विचार आया - यहां तो लड़के और लड़कियों को बिगाड़ा जा रहा है। हमारी संस्कृति को भ्रष्ट किया जा रहा है। अरे कुछ सुविचार लिखे होते तो ठीक था पर ये तो....।  अच्छा शहर तो कतई नहीं है। वो भी यूनिवर्सिटी के बाहर इतने बड़े-बड़े होर्डिंग पर लिखने की क्या जरूरत है? अस्पताल के बाहर लिख देते तो कुछ ठीक था - कॉलेज के बाहर? – बाप रे बाप।
इन्हीं अधूरे और अधकचरे विचारों के साथ दिन दिन गुजरने लगा। कल जब एक खबर आई तो सोचा क्यों ने इस पर कुछ लिखा जाए। खबर थी कि एक लड़का और एक लड़की प्रेम करते थे। प्रेम इतना कि दोनों लिवइन में रहने लगे। देश विदेश भी घूम आए। इतना तो पक्का है दोनों कँडोम के साथ चले होंगे। कुछ दिन बीत जाने के बाद लड़की ने लड़के से कहा मुझे, तुमसे शादी करनी है। लड़के ने कहा – ये तो नहीं हो पाएगा। मेरे घर वाले तैयार नहीं होगे। लड़की आहत थी। उसने सुसाइड कर लिया।
स्त्री-पुरुष के इस स्वाभाविक रिश्ते में आखिर क्या वजह है कि लड़की कमजोर हो जाती है? अगर शारीरिक सम्बंध बनाना इज्जत का चले जाना है तो पुरुष तो सबसे बेइज्जत इंसान हुआ? उपरवाले केस में लड़का न सिर्फ बेइज्जत इंसान है बल्कि एक धोखेबाज और अपराधी भी है। फिर भी सुसाइड लड़की ने ही क्यों की?  उसे क्यों लगने लगता है कि उसकी इज्जत चली गई। उसका सबकुछ लुट गया। वह अब जीने के काबिल नहींलड़के पर तो कोई फर्क नहीं पड़ा। वह तो अपने परिवार के भरोसे है कि अपने संस्कारी बेटे के लिए मम्मी-पापा एक संस्कारी बहू लाएंगे। अगर वह सबसे बड़ी इज्जत है तो उसका ठेका लड़की ही क्यों उठाए?
दरअसल यह शदियों पुरानी पुरुषवादी सोच है जो औरतों पर इतनी बार थोपी गई कि उनके हृदय के कोने कोने में काई की तरह चिपक गई है। सुसाइड पुरुष भी करे तो मानें कि यह सचमुच इज्जत थी जो शारीरिक सम्बंध बना लेने क बाद चली गई पर ऐसा नहीं है।
लड़का-लड़की जब बड़े होते हैं तो यह एक स्वाभाविक इच्छा है जो दोनों के भीतर प्रकट होती है। इसे रोका नहीं जा सकता है। पिछले दिनों एक आलेख पढ़ा जिसमें एक लेखिका ने हस्थमैथुन के बार में लिखा था। यह भी अपनी उस प्राकृतिक इच्छा को पूर्ण करने का एक तरीका है। अब आता हूँ दिल्ली यूनिवर्सिटी के कॉलेज के सामने लगे उस होर्डिंग्स पर जिस पर लिखा था – चलो कँडोम के साथ। मुझे बाद में समझ आया कि यह कहीं से भी गलत नहीं था। समाज चिंतकों को भी पता है यह एक ऐसी इच्छा है जिसे रोका नहीं जा सकता। रोकने से और भी कई अनगिनत सामाजिक और शारीरिक व्याधियां पैदा होंगी। बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, छोटी-छोटी बच्चियों से बलात्कार उन्हीं सामाजिक बीमारियों में से एक है। पर यह हमारे समाज का एक ऐसा अछूत मुद्दा बना हुआ है जिस पर कोई बहस नहीं करना चाहता। कोई रास्ता नहीं खोजना चाहता है। समस्याओं में जीने की जैसे आदत सी बन गई हैं। हम सोच रहें कानून बना देने से ये समस्याओं खत्म हो जाएंगी – कभी खत्म नहीं होंगी। सामाजिक बुराइयों का हल समाज में नया बदलाव लाकर ही किया जा सकता है-कानून से नहीं।
आज भी हमारा समाज पुरुषमानसिकता से उबर नहीं पाया है। आज भी औरतों की बुनियादी जरूरतों को समस्या के रूप में देखा जाता है। औरतों के मन में भी इतना भर दिया गया है कि अगर उन्हें पीरियड्स आ रहें हैं तो यह एक समस्या है-छुपाना है किसी को पता न चल जाए। अगर उन्हें यूरिन आ रही है तो ये यह एक समस्या है-रोके रखना है जिक्र तक भी नहीं करना है – लोग क्या सोचेंगे? उनके भीतर सेक्स की भावना पैदा होना भी एक समस्या है-सबसे बड़ा अपराध है-बोल भी मत देना किसी से-लोग क्या सोचेंगे? ये समस्याएं आज भी उसी रूप में बनी हुई हैं। सेनेट्री नैपकीन की सहज उपलब्धता नहीं होने के कारण हजारों महिलाएं अनगिनत बीमारियों से ग्रसित होकर असमय दम तोड़ देती हैं। घर से निकलते समय पानी नहीं पीती हैं क्योंकि यूरिन के लिए कहीं व्यवस्था नहीं है। एक बार किसी ने लिखा था कि वह मॉलों में शापिंग करने नहीं बल्कि कई बार सिर्फ यूरिन के लिए जाती हैं। पानी न पीने से कई बीमारियों की शिकार हो जाती हैं।

समय बदल रहा है जरूरत है उस बदलाव को स्वीकार करने और उसे परिष्कृत करते हुए आगे बढ़ने की। वक्त है अपनी जरूरतों को अपने बूते जागरूकता और समझदारी से पूरा करने की। आप न किसी का शिकार करें और ना शिकार हों बल्कि हर कदम आपसी सहमति और सोच से आगे बढ़ाएं। देखना कभी सुसाइड करने की जरूरत न पड़ेगी। अपने आपको ठगा हुआ महसूस करने की जरूरत न पड़ेगी।   

सोमवार, 13 मार्च 2017

हम विकसित हो रहे हैं, पर कहाँ जा रहे हैं?

हम दो संस्सारों से मिलकर बने हैं एक संस्सार बाहरी है और दूसरा भीतरी। हमारी ज्यादातर कोशिश बाहरी संस्सार को बेहतर और बेहतर बनाने की होती है - जैसे एक अच्छा घर हो, एक अच्छी गाड़ी हो, एक सुंदर पत्नी हो, एक दो सुंदर बच्चे हों, ज्यादा से ज्यादा पैसे आने के स्रोत हों और फिर उस पैसे से कुछ भी खरीद लेने का भरोसा हो – हम पूरा जीवन इसी तरह के विकास की चाह में तो खपाते हैं?
दूसरा संस्सार है हमारा भीतरी जीवन। इसके डेवलपेंट के लिए हम कुछ नहीं करते। जो थोड़ा बहुत कर्मकांड करते हैं – ईश्वर की शरण में जाते हैं – दान पूण्य का काम करते हैं वो सब भी पहले वाले संस्सार को और मजबूत करने के लिए करते हैं। हम मंदिर में – मस्जिद में – गुरुद्वारे में – चर्च में इसलिए कभी नहीं जाते कि – हे ईश्वर पिछले दिनों मुझसे कई गलतियाँ हो गईं थीं (यह तय है गलतियाँ हुई ही होती हैं) – मुझे माफ करना – आगे से कोई गलती नहीं करूँगा। गीता – कुरान- बाइबल में जिन नैतिक मूल्यों का उल्लेख है उसको अमल में लाऊंगा। हमारी पूरी कोशिश हमारा पूरा कर्मकांड ऊपर वाले संस्कार को और बड़ा और समृद्ध करने के लिए ही होते हैं। किसी ने बताया कि हवन करवा लो तो ज्यादा पैसे आने के स्रोत खुल जाएंगे – फलाँ अंगूठी पहन लो तो घर गाडी बंगले के होने की संभावना बढ़ जाएगी। फलाँ देवता के दर्शन कर लो तो जीवन में कभी कष्ट नहीं आएंगे। हम कहाँ मानने वाले?
भीतरी संस्सार को परिस्कृत और परिमार्जित करने के लिए न तो अब घरों में बताया जाता है और न स्कूलों में सिखाया जाता है। अब तो हम में से ज्यादातर लोगों का सिद्धांत बन गया है कि पैसा है तो सबकुछ है। इसलिए पैसे कमाओ जितना ज्यादा से ज्यादा हो सके। मुझे तो इतिहास में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला जिसे हम उसके ज्यादा से ज्यादा पैसे होने की वजह से जानते हैं  - बल्कि इसलिए जानते हैं - याद करते हैं - उसका अनुसरण करते हें कि उसका भीतरी संस्सार बहुत समृद्ध था - परिस्कृत था - सुंदर था - नैतिक था - शुभ था।

यह सच है कि काल्पनिक धर्मग्रंथों में उल्लेखित कुछ दुनियाओं को अगर दरकिनार कर दें तो मुझे नहीं लगता बाहरी संस्सार के विकास के लिहाज से इतना डेवलप्ड संस्सार कभी रहा होगा। आप जरा नजर दौड़ाइयेगा आज हमारे पास-पास वो सब चीजें हैं मौजूद हैं जो कुछ साल पहले तक लोगों के लिए सपना हुआ करती थीं। सच ये भी है कि हमारा बाहरी संस्सार समृद्ध पर समृद्ध होता जा रहा है और आंतरिक संस्सार उतना ही जर्जर और विपन्न। हम सब पिछड़ जाने के भय से विकसित हो जाना चाहते हैं – एक दूसरे से आगे बढ़ जाना चाहते हैं - हम सबको लग रहा होगा कि हम ऊपर की तरफ बढ़ रहे हैं पर दरअसल हम नीचे की तरफ जा रहे हैं। मुझे लगता है समय के साथ-साथ जिस जीवन में प्रेम का विस्तार होते जाना चाहिए था उसमें से प्रेम नदारद होता जा रहा है।