मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017



28-02-2017


cba foundation survey Report
PART-II



स्वास्थ्य को लेकर समाज के लोग कैसे जागरूक हों – कैसे सचेत हों – इस दिशा में cba Fondation काम कर रहा है। झुग्गी में रहने वालों से लेकर महलों में रहने वालों तक में अपने बेहतर स्वास्थ्य के प्रति समझ नहीं है। हमारे अस्वस्थ होने के 90 प्रतिशत कारणों में हमारी नासमझी या जागरूकता का अभाव है।    

cba Fondation की टीम 28 फरवरी को दिल्ली के लेप्रोसी (कोढ़) कॉलोनी गई। यह जानने के लिए कि ये लोग कैसे रहते हैं? इनका स्वास्थ्य कैसा है? अगर ये कोढ़ से पीड़ित हैं तो इनको घरों का गुजारा कैसे होता है? इनका परिवार किस मानसिक प्रताड़ना से गुजरता है? समाज का नजरिया इनके प्रति कैसा होता है? क्या इनके बच्चे हैं? अगर हैं तो उनकी शिक्षा दीक्षा कैसे होती है? कई सवालों के साथ उनके बीच रहा। बहुत कुछ जानने को मिला जो सचमुच चौंकाने वाला था।
इनकी अलग बस्ती है। रहने के लिए कुछ झुग्गियां हैं तो कुछ ईंट के घर भी बन गए हैं।  इनको जो सरकारी मदद मिलती है बहुत सीमित है। HOPE के अलावा दर्जन भर से ज्यादा एनजीओ इनके बीच काम कर रहे हैं। कोढ़ पीड़ित मरीजों का इलाज, इनके परिजनों में जो स्वस्थ हैं उनको ट्रेनिंग वगैरह देकर रोजगार के लिए तैयार करने का काम गैर सरकारी संगठनों द्वारा किया जा रहा है।
       कहा जाता है कि कोढ़ पीड़ित मरीजों से मिलने, उनके साथ उठने बैठने, खाने पीने से कोढ़ नहीं फैलता। फिर भी समाज में उन्हें वह सम्मान हासिल नहीं है। सरकार की तरफ से 1500 से 1800 रुपये तक जो मासिक मदद मिलती है वह नाकाफी है। अल्परूप से कोढ़ पीड़ित महिलाएं अपना घर चलाने के लिए कई काम करती हैं। वह लोगों के घरों में झाड़ू-पोछा-बर्तन करती हैं। पीड़ित पुरुष कोठियों में या सोसाइटियों में गार्ड्स के रूप में काम करते हैं। ठेले लगाते हैं, रिक्शा चलाते हैं वगैरह-वगैरह। सबकुछ छुपाकर होता है। स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता नहीं होने के कारण कई बुरी आदतों के शिकार होते हैं। कोढ़ पीड़ित मरीज टीबी का मरीज भी हो जाता है।
दर्जन भर से ज्यादा एनजीओ यहाँ काम कर रहे हैं पर यहाँ के लोगों का सामाजिक और मानसिक स्तर कैसे इम्प्रूव हो – इस दिशा में कोई काम नहीं हो रहा है। नेताओं की तरह शायद ये लोग भी यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं। कोढ़ पीड़ित कई परिवार ऐसे मिले जिनके चार-चार, पाँच पाँच बच्चे हैं। क्या एक दो से ज्यादा बच्चे गरीब को गरीब बने रहने के मूल कारणों में से एक नहीं है? लोग परिवार नियोजन से अनभिज्ञ हैं। कोई एनजीओ इस दिशा में काम नहीं कर रहा है। हाँ, सबने अपने अपने काम बाँट लिए हैं। एक दो एनजीओ ऐसे भी मिले जो इनके चार-चार बच्चों का खर्चा उठाते हैं – पढ़ाते हैं – खिलाते हैं – कपड़े पहनाते हैं। ऐसे माहौल में जीवित तो रहा जा सकता है पर सामाजिक स्तर कभी भी ऊपर नहीं उठाया जा सकता। जब तक बेहतर स्वास्थ्य और बेहतर शिक्षा के प्रति लोगों का झुकाव नहीं होगा किसी भी तरह का बदलाव मुश्किल है। यहाँ यही नहीं हो रहा है। चार-चार, पाँच-पाँच बच्चे बड़े होकर जुआ खेल रहे हैं, सट्टा लगा रहे हैं, दारू बेच रहे हैं, चोरी कर रहे हैं वगैरह वगैरह।
feedback@ 
foundationcba@gmail.com

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017


20-02-2017
cba Foundation Survey Report
PART-1


समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जहाँ आजादी के इतने सालों बाद भी सरकारी योजनाएं नहीं पहुंच पाई हैं। शिक्षा नहीं के बराबर है। आर्थिक रूप से बेहद पिछड़े हैं। बीमार हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है। जागरूकता के अभाव के कारण अपने अधिकारों और कर्तव्यों दोनों से वंचित हैं।
रेल की पटरियों के किनारे, नालों के किनारे एवं अन्य बुनियादी सुविधाओं के अभाव वाली अनगिनत कॉलोनियाँ किसी भी शहर में आपको मिल जाएंगी। गैर सरकारी संगठन सीबा फाउंडेशन (cba foundation) ने पिछले दिनों ऐसे ही कुछ इलाकों का दौरा किया। सर्वे के दौरान जो तथ्य सामने आए उसके मुताबिक इन इलाकों में रहने वाले ज्यादातर लोगों में शिक्षा का अभाव है, आर्थिक रूप से बेहद पिछड़े हैं, स्वास्थ्य के प्रति जागरूक नहीं हैं, परिवार नियोजन का उन्होंने अपने जीवन में कभी पालन नहीं किया। दूसरे शब्दों में कहें तो किसी भी सरकारी संस्था ने इन्हें इस बारे में जागरूक करना मुनासिब नहीं समझा।

आर्थिक विपन्नता और इस अनुपात में परिवार के सदस्यों की ज्यादा संख्या ऐसे परिवारों को कभी भी गरीबी, भुखमरी से उबरने नहीं देती। ऐसे परिवारों के ज्यादातर बच्चे कुपोषण के शिकार पाए गए। संतुलित भोजन के अभाव में परिवार के वयस्क भी अनगितन बीमारियों के ग्रस्त मिले। आर्थिक रूप से कमजोर इन वर्गों के ज्यादातर लोग झोलाछाप डॉक्टरों के भरोसे होते हैं। अंतत: परिणाम यह होता है कि वे असमय मृत्यु के प्राप्त हो जाते हैं।

सीबा फाउंडेशन के अध्ययन में जो नतीजे समाने आए उसके मुताबिक ऐसे परिवारों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करना अत्यंत आवश्यक है। स्वच्छता के अभाव में ज्यादातर परिवारों में लोग गंदगी से होने वाली बीमारियों से ग्रस्त मिले। ऐसे परिवारों की मासिक कमाई यदि 1000 रुपया है तो उसमें से करीब 400-500 रुपया उनकी बीमारी में खर्च हो जाता है।


स्वच्छता के अभाव, शिक्षा के अभाव,  स्वास्थ्य एवं परिवार नियोजन के प्रति जागरूकता के अभाव के कारण ज्यादातर परिवार आर्थिक रूप से ऊपर नहीं उठ पाते और आजादी के इतने सालों बाद भी गरीबी और भुखमरी के शिकार हैं।