मीडिया की भाषा
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संतोष राय
पहले लोग अखबारों को पढ़कर, दूरदर्शन को
देखकर भाषा सीखते थे या कहें सुधार करते थे। ये मान्यता थी कि जिस भाषा और जिन
शब्दों में खबरें छपती हैं वे शुद्ध होती हैं, बोलचाल में होती हैं, सहज होती हैं।
यही बात सूचनाओं को लेकर भी था कि जो अखबार में छप गया वो सही है। उसे अदालतों में
सबूत के तौर पर पेश किया जाता रहा है।
अखबारों और दूरदर्शन के प्रति ये धारणा
बहुत पुरानी हो गई है। अब हम ये गारंटी नहीं ले सकते कि अखबार हमारी भाषा
सुधारेगा। अखबारों और दूरदर्शनों (सभी न्यूज चैनलों) का भाषाई स्तर काफी गिरा है।
और इस गिरावट में सबसे बड़ा सहभागी टेलीविजन मीडिया है यानी हमारे न्यूज चैनल।
न्यूज चैनलों ने न सिर्फ भाषा के स्तर पर गिरावट पैदा की है बल्कि सूचना के स्तर
पर भी काफी भ्रम पैदा किया है। न्यूज चैनल जिन मास्टर शब्दों का प्रयोग करते हैं
उसके गलत मायने निकलने की आशंका ज्यादा होती है। जैसे- हत्यारा प्रोफेसर ! अथवा हत्यारा
प्रोफेसर? इन दोनों शब्दों का
कतई अर्थ नहीं कि प्रोफेसर हत्यारा है। परन्तु अस्सी परसेंट न्यूज चैनल देखनों
वालों को विस्मयाधिबोधक और प्रश्नवाचक चिह्न पर का मतलब नहीं पता- तो वे यही अर्थ
ग्रहण कर लेते हैं कि प्रोफेसर हत्यारा है। कई बार जब लोगों से बात करो तो यही
कहते हैं कि फलां प्रोफेसर हत्यारा है, टीवी वाले दिखा रहे थे।
इस प्रकार न्यूज चैनल भाषा के स्तर पर,
सूचना के स्तर पर भ्रम फैलाते हैं। टेलीविजन मीडिया का ज्यादा से ज्यादा मास्टर
शब्द, प्रश्नवाचक या विस्मयाधि बोधक चिह्न वाले ही होते हैं। सामान्य पढ़े लिखे
लोगों या फिर तकनीकी साक्षरों को भी समझ नहीं आता। टेलीविजन का मास्टर शब्द,
मास्टर भ्रम फैला देता है।
टेलीविजन की वजह से क्षेत्रीय बोलियों
का महत्व भी कम होता जा रहा है। टीवी पर प्रस्तोता जो भाषा बोलता है, ऐसा लगता है
कि वही राष्ट्रीय भाषा है। क्षेत्रीय बोली बोलने वालों को अपराध बोध लगता है कि वो
अभी भी क्षेत्रीय बोली बोल रहे हैं।
क्षेत्रीय बोलियां लुप्त होती जा रही
हैं। खड़ी बोली हिंदी भी विशुद्ध नहीं रह गई है। हिंदी न्यूज चैनलों में पूरी तरह से
हिंगलिश चल रहा है। अब तो वही टेलीविजन भाषा मास्टर भाषा बनती जा रही है। पहले
साहित्यिक शब्द प्रबुद्ध होने की पहचान देते थे पर अब तो सबकुछ गायब होता जा रहा
है।
जिसे पहले साहित्यिक भाषा कहा जाता था अब
तो भाषा के गड़बड़ाइजेशन की वजह से लुप्त होती जा रही है। भावों को वहन करने वाले
अच्छे शब्द गायब होते जा रहे हैं। क्षेत्रीय शब्द लुप्त हो रहे हैं। कहने को हिंदी
प्रगति पर है पर हिंदी प्रगति पर नहीं बल्कि हिंदी, इंगलिश का चोला ओढ़ने को मजबूर
है। इसके लिए जिम्मेदार मीडिया ही है।
पहले जो लोग मीडिया में आते थे भाषा और
विषय सम्बंधी ज्ञान से सम्पन्न होते थे। समाचार पत्रों के सम्पादक बड़े विद्वान
होते थे। परन्तु अब संपादक के पद पर कारोबारी बैठ गए हैं और उनके मातहत काम करने
वाले उसके कारोबार को बढ़ाने वाले लेबर। ऐसा जब तक चलता रहेगा भाषा के परिष्कृत
होने की संभावना कम ही है।

