संकट
की घड़ी में सुंदरकांड पढ़े कांग्रेस!
रामचरित
मानस के सुंदरकांड में एक दोहा है – “तात चरण गहि मागऊँ, राखहुं मोर दुलार।
सीता देहु राम कहु अहित ने होतु
तुम्हार।।“
जिसमें विभीषण अपने बड़े भाई रावण से
कहते हैं- “भ्राताश्री
मैं आपकी चरण पड़ता हूं। मुझे भरोसा है आप छोटे भाई की बात पर गौर करेंगे। मैं
कहूंगा कि सीता जी को प्रभु राम को सौंप दें इसमें आपका कोई अहति नहीं होगा।“
इतना सुनते ही रावण क्रोध से भर गया और उसने विभीषण को लात से मारा और भाग जाने को
कहा।
यह
दोहा अचानक याद आ गया। इस दोहे का निहितार्थ कांग्रेस पार्टी के वर्तमान परिदृश्य
पर बिल्कुल फिट बैठता है। लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद पार्टी को शुभ सलाह
देने वाले पंजाब से पूर्व सांसद जगमीत सिंह बराड़, हरियाणा से चौधरी बीरेंद्र
सिंह, राजस्थान से मकसूद अली को पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है।
लोकसभा
चुनाव में पार्टी को मुंह की खाने के बाद राहुल गांधी के नेतृत्व क्षमता का मजाक
विपक्षी पार्टियों ने खूब बनाया। पार्टी के भीतर भी सवाल उठे कि चुनाव में हार
राहुल गांधी के लचर नेतृत्व की वजह से हुई है। कांग्रेस को चाहिए था कि चुनाव के
बाद पार्टी नेताओं से राय लेती, पार्टी कार्यकर्ताओं से सुझाव मांगती। पर ऐसा उसने
कुछ नहीं किया जो किसी भी लोकतांत्रिक पार्टी के लिए जरूरी होता है।
कांग्रेस
ने पार्टी के सबसे कथित ईमानदार ए. के. एंटनी की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई ताकि
हार के कारणों की सही समीक्षा हो सके। कमेटी ने ठीक आजादी के दिन अपनी रिपोर्ट
कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को सौंप दी और राहुल गांधी को सभी आरोपों से बरी
और आशंकाओं से मुक्त कर दिया। रिपोर्ट में हार के कारणों में मीडिया को भी
जिम्मेदार ठहराया गया है। रिपोर्ट सौंपते के बाद कमेटी के अध्यक्ष ए. के. एंटनी ने
कहा- “हम
लोग सोनिया गांधी और राहुल गांधी के नेतृत्व में फिर संभल जाएंगे।“
कांग्रेस
की हार, हार की समीक्षा और उसकी रिपोर्ट के बाद रामचरित मानस का सुंदरकांड फिर याद
आ रहा है। उसमें एक चौपाई है – “सचिव, वैद, गुरु तीनि जौ प्रिय बोलहिं
भय आस। राज - धर्म - तन तीनि कर होई बेगिहीं नास।।“
अर्थात् यदि कोई सचिव अपने राजा से झूठ बोलता है तो राजा का
नास संभव है। यदि धर्म की शिक्षा देने वाला गुरु झूठ बोलता है तो धर्म नष्ट होना
तय है और यदि इलाज करने वाला वैद्य झूठ बोलता है तो तन कभी भी स्वस्थ नहीं हो
सकता।
अच्छे
प्रशंसक की हमेशा जरूरत पड़ती है और सच्चे आलोचक की भी। कहा भी जाता है - "निंदक
नियरे राखिये आँगन कुटी छवाए बिन साबुन पानी बिना निर्मल करत सुभाय।" ऐसा
लगता है कांग्रेस की सच्ची प्रशंसा करने वाला कोई बचा नहीं है और वह निंदकों की
बातों को ज्यादा तवज्जों देने के मूड में नहीं है। इन दोनों ही स्थितियों में वह
फेल है। अब बचे तीसरे स्तर के दोयम दर्जे के लोग जिन्हें चापलूस या चमचों की संज्ञा
दी जाती है। जो अपने मालिक को कभी भी उसकी गलतियों से अवगत नहीं कराते। गलत काम
में भी उनकी प्रशंसा करते रहते हैं। यदि कोई सच्ची आलोचना करे तो उसे पार्टी लाइन
के खिलाफ बताकर बाहर का रास्ता दिखाने में पार्टी मुखिया का भरपूर सहयोग करते हैं।
जैसा कि पिछले दिनों हुआ कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने राहुल गांधी के नेतृत्व की
आलोचना की तो उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
कांग्रेस
पार्टी की स्थिति विनास काले विपरीत बुद्धि वाली हो गई है। संकट की घड़ी में
कांग्रेस को सुझाव यही है दिया जा सकता है कि वह सुंदरकांड का भावार्थ सहित पाठ
करे। पूरा विश्वास है वह एक दिन फिर से खड़ी हो जाएगी। नेता और नीतियां सही हों तो
कोई भी पार्टी खत्म नहीं हो सकती। बीजेपी भले ही खत्म कर देने की कसमे खा रही हो।






