सोमवार, 29 मई 2017

विवाह की भी एक मियाद हो!
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विनोद खन्ना जी नहीं रहे-किसी को भी नहीं रहना है। एक न एक दिन जाना ही है। खबरों में पढ़ते हुए पता चला कि विनोद खन्ना जी अपनी पहली पत्नी गीतांजलि से दो बच्चों के बाद अलग हो गए थे। लोग कहते हैं उन्होंने ऐसा ओशो के संसर्ग में आने के बाद किया था। पांच साल बाद जब ओशो-आश्रम से वापस आए तो उन्होंने कविता से दूसरी शादी की। गीतांजलि और कविता दोनों से दो-दो बच्चे हैं।
जब हम ओशो को दोष देते हैं कि उनकी की वजह से विनोद खन्ना अपनी पहली पत्नी गीतांजलि से अलग हुए थे या गीतांजलि ने विनोद खन्ना को छोड़ा था- तो हमारा ध्यान ओशो के उस विचार की तरफ बरबस जाता है जब उन्होंने विवाह जैसी व्यवस्था पर सवाल उठाया था। उसे अनैतिक और बंधन वाला बताया था। कुछ लोग उनके इस विचार को उछृंखलता से जोड़कर देखते हैं। मतलब कि शादी करने की जरूरत ही क्या है। बिना विवाह के रहो।
अभी इस तरह की व्यवस्था बननी बाकी है कि स्त्री-पुरुष का वास्तविक रिश्ता क्या हो-उसका सामाजिक स्वरूप क्या हो? – उसका सामाजिक ढांचा क्या हो? ये मत सोचियेगा कि विवाह व्यवस्था सदियों से चली आ रही है। यह भी एक व्यवस्था की घुटन के बाद उपजी दूसरी व्यवस्था है। यह सार्वभौमिक सच नहीं है। मतलब की विवाह जैसी सार्वकालिक लगने वाली व्यवस्था भी घुटन पैदा कर रही है। तलाक के मामले बढ़ रहे हैं। विवाह के बाद परिवार में कलह बढ़ रहे हैं।
अपने प्रिय लेखक राजकिशोर जी का एक आलेख आज पढ़ रहा था जिसमें उन्होंने एक सुझाव दिया है कि क्यों न विवाह की भी एक मियाद तय हो? मतलब की सात साल बाद विवाह का बंधन अपने आप समाप्त हो जाए - अगर पति-पत्नी फिर भी साथ रहना चाहें तो एक समझौते के तहत इस मियाद को आगे बढ़ा सकते हैं। अगर दोनों को बच्चों की आवश्यकता है तो शादी की यह मियाद 20 साल की हो। विवाह के बाद वाली घुटन से निपटने का यह एक हल हो सकता है। सार्वभौमिक सच नहीं। इस बादलाव के बाद भी घुटन होगी ही फिर बदलाव की मांग होगी। यह परिवर्तन चलता रहेगा।