यादववाद के बाद ठाकुरवाद
इलाहाबाद के जार्ज टाउन
थाने के पास से गुजर रहा था। थाने के भीतर से तेज आवाज आ रही थी। मुझे लगा हो सकता
है कोई पुलिसवाला किसी आम आदमी पर रौब झाड़ रहा हो। पर भाषा पुलिस वाले की थी
नहीं। पास पहुंचा तो देखा 30-35 साल का एक युवा थाना प्रभारी को खूब खरी-खोटी सुना
रहा था। उसका ट्रांसफर और उसे नौकरी से बर्खास्त करा देने की धमकी दे रहा था। किसी
को पकड़ने और उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का निर्देश दे रहा था। उल्टी गंगा बह
रही थी। जब वह युवक चला गया तो पता चला कि वह कोई फलाँ ठाकुर थे-सिंह साहेब थे।
मुझे इसके पीछे की कहानी
समझने में देर ना लगी। यूपी में सबकुछ वैसे ही चल रहा है जैसा पिछली अखिलेश यादव
सरकार में था। पहले यादव सरकार थी अब ठाकुर सरकार है। पहले हर यादव खुद को अखिलेश
यादव का रिश्तेदार समझता था-गुँडई करता था। लोग कहने लगे हैं कि अब वह सबकुछ ठाकुर
कर रहे हैं।
मुख्यमंत्री जी भले ही अपना
नाम योगी आदित्यनाथ लिखते हों पर धीरे धीरे पब्लिक जान गई है कि वह ठाकुर साहेब
हैं-सिंह साहेब हैं-राजपूत जी हैं। फिर क्या जिस प्रकार एक समय यादवों में गुरूर
का भाव आ गया था ठीक उसी प्रकार अब ठाकुरों में वही भार भर गया है। भाव ऐसे नहीं
भरता। सरकार की गतिविधियां इस बात का संकेत दे देती हैं कि वह किस दिशा में चल रही
है।
जब यूपी सरकार जीत के गर्भ
में थी तो मनोज सिन्हा का नाम यूपी के मुख्यमंत्री की रेस में सबसे आगे था। उस समय
प्रदेश का भूमिहार अपने उत्थान के सपने देखने लगा था। दूसरे शब्दों में कहूँ तो
उसके भीतर भी वही गुरूर भरने लगा था जो कभी यादवों में था, अब ठाकुरों में है।
मनोज सिन्हा मुख्यमंत्री बनते तो वही भाव भूमिहारों में भी गहराई से भर जाता इसमें
कोई संदेह नहीं है। इन घटनाओं से एक बात तो साफ है कि प्रदेश जातिवाद में आकंठ
डूबा हुआ है। हर जाति शिकार की तलाश में बैठी है।
मुझे यह नहीं पता कि सरकार
बनने के बाद उच्च पादसीन व्यक्ति अपनी जाति के लोगों को बिगड़ैल बन जाने का
निर्देश देता है या नहीं पर जातियां स्वंयभू तरीके से पशुवत जरूर बन जाती हैं। इस
तरह के सवाल पत्रकारों द्वारा अखिलेश यादव से भी कभी पूछते नहीं सुना और अब योगी
सरकार में भी किसी पत्रकार के पूछने की उम्मीद नहीं है। जो बीजेपी सर्वधर्म समभाव
एवं वशुधैव कुटुम्बकम की बात करती रही है परिणाम बता रहे हैं कि वह भी कितनी
संकुचित सोच की कितनी धनी है।
