बुधवार, 19 नवंबर 2014

                                                 महिला अपराध, कौन जिम्मेदार?

·       संतोष राय

पिछले दिनों एक संगोष्ठी में शामिल होने का मौका मिला। विषय था महिला अपराध, घर बाहर की चुनौतियां। इस विषय पर अपना पर्चा पढ़ने वाली महिला बुद्धिजीवियों की संख्या ज्यादा थी। इनके मुकाबले पुरुष बहुत कम थे। सोचा था महिलाओं की संख्या ज्यादा है कुछ अनछुए पहलू सामने आएंगे। दुर्भाग्य था कि ज्यादा से ज्यादा पर्चों में महिलाओं के प्रति होने वाली यौन हिंसा को ही सबसे बड़ा बनाकर पेश किया गया। यौन हिंसा कब हिंसा है कब नहीं इसके बीच सहमति और असहमति की बहुत पतली रेखा होती है। यह सहमति और असहमति पर निर्भर है कि उसे कब यौन हिंसा कहा जाए कब नहीं। पहनावे को लेकर भी चर्चा हुई। मंथन हुआ कि क्या लड़कियों के ड्रेश भी यौन हिंसा को बढ़ावा देते हैं? महिला बुद्धिजीवियों ने चर्चा के दौरान कहा कि हां, ड्रेस जिम्मेदार हैं। लेकिन इसके साथ-साथ टेलीविजन, फिल्म और इंटरनेट का भी बड़ा योगदान है। दूषित मानसिकता का पुरुष इन जगहों से अपने मन को विकृत करता है और इसका इस्तेमाल बच्चियों एवं बुजुर्गों महिलाओं तक के साथ करने से नहीं हिचकिचाता। यौन हिंसा को रोकने के लिए जरूरी है टेलीविजन, फिल्म और इंटरनेट से सीधे घरों तक पहुंचने वाली अश्लीलता को रोकना।

जब हम महिला अपराध की बात करते हैं तो उसमें कन्या भ्रूण हत्या, दहेज के लिए प्रताड़ना, अपेक्षित संतान की उत्पत्ति न कर पाने पर शारीरिक, मानसिक प्रताड़ना से लेकर सड़क पर छेड़छाड़ व दफ्तर में बॉस या सीनियर द्वारा मानसिक, शारीरिक प्रताड़ना शामिल है। इन महिला अपराधों में पचास फीसदी मामलों में पुरुष वर्ग दोषी नहीं है बल्कि महिला वर्ग दोषी है। जैसे कि कन्या भ्रूण हत्या और दहेज सम्बंधी मामलों में महिला पर होने वाले अत्याचार के लिए सास और ननद की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यदि एक बहू को ससुराल पक्ष की महिलाओं द्वारा पर्याप्त प्यार और स्नेह मिले तो महिलाओं के प्रति होने वाली घरेलू हिंसा नब्बे प्रतिशत तक खत्म हो सकती है। बाकी जो दस प्रतिशत हिंसा बची है वह ऐसे पुरुषों के कारण है जो या तो शराबी हैं या फिर स्त्रियों के प्रति किसी घृणा से प्रेरित हैं।
शिक्षित महिलाओं का स्तर बढ़ा है लेकिन पर्याप्त नहीं है। महिलाएं जैसे-जैसे शिक्षित और सजग होती जाएंगी अपने पर होने वाली किसी भी हिंसा से मुकाबला करने में सक्षम होंगी। शिक्षा ही उन्हें घर, परिवार और समाज में समानता दिला पाने में मददगार साबित होगी। अभी भी एक भ्रम बना हुआ है कि पुरुष का तात्पर्य है स्त्री विरोधी और कमोबेस पुरुष के मन में भी एक भ्रम है कि स्त्री का मतलब पुरुष विरोधी। एक पुरुष, जो कि आपराधिक मानसिकता का हो सकता है, उसके अपराध करने पर सारे पुरुषों को भी उसी खांचे में डाल दिया जाता है। ठीक उसी तरह किसी महिला के ऐसे ही किसी अपराध में शामिल होने के बाद सबको एक साथ ला खड़ा किया जाता है। जबकि ऐसा नहीं है। जो लोग आपराधिक कामों, या समाज विरोधी कामों में लगे हैं उनकी अलग मानसिकता होती है। सुखद ये है कि इनकी संख्या बेहद कम है बावजूद इसके सकारात्मक सोच वाले अपने अनुकूल माहौल नहीं बना पाते। चारों ओर नकारात्मकता का ही माहौल हावी रहता है। 


स्त्री-पुरुष में शारीरिक भिन्नता भले हो पर समान अवसर मिले तो दोनों के बौद्धिक क्षमता में कोई अंतर नहीं है। आज महिलाएं करीब-करीब सभी क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं। उम्मीद करते हैं कि आने वाले दिनों में इसमें और इजाफा होगा।  

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

मीडिया की भाषा

·        संतोष राय
पहले लोग अखबारों को पढ़कर, दूरदर्शन को देखकर भाषा सीखते थे या कहें सुधार करते थे। ये मान्यता थी कि जिस भाषा और जिन शब्दों में खबरें छपती हैं वे शुद्ध होती हैं, बोलचाल में होती हैं, सहज होती हैं। यही बात सूचनाओं को लेकर भी था कि जो अखबार में छप गया वो सही है। उसे अदालतों में सबूत के तौर पर पेश किया जाता रहा है।

अखबारों और दूरदर्शन के प्रति ये धारणा बहुत पुरानी हो गई है। अब हम ये गारंटी नहीं ले सकते कि अखबार हमारी भाषा सुधारेगा। अखबारों और दूरदर्शनों (सभी न्यूज चैनलों) का भाषाई स्तर काफी गिरा है। और इस गिरावट में सबसे बड़ा सहभागी टेलीविजन मीडिया है यानी हमारे न्यूज चैनल। न्यूज चैनलों ने न सिर्फ भाषा के स्तर पर गिरावट पैदा की है बल्कि सूचना के स्तर पर भी काफी भ्रम पैदा किया है। न्यूज चैनल जिन मास्टर शब्दों का प्रयोग करते हैं उसके गलत मायने निकलने की आशंका ज्यादा होती है। जैसे- हत्यारा प्रोफेसर ! अथवा हत्यारा प्रोफेसर? इन दोनों शब्दों का कतई अर्थ नहीं कि प्रोफेसर हत्यारा है। परन्तु अस्सी परसेंट न्यूज चैनल देखनों वालों को विस्मयाधिबोधक और प्रश्नवाचक चिह्न पर का मतलब नहीं पता- तो वे यही अर्थ ग्रहण कर लेते हैं कि प्रोफेसर हत्यारा है। कई बार जब लोगों से बात करो तो यही कहते हैं कि फलां प्रोफेसर हत्यारा है, टीवी वाले दिखा रहे थे।

इस प्रकार न्यूज चैनल भाषा के स्तर पर, सूचना के स्तर पर भ्रम फैलाते हैं। टेलीविजन मीडिया का ज्यादा से ज्यादा मास्टर शब्द, प्रश्नवाचक या विस्मयाधि बोधक चिह्न वाले ही होते हैं। सामान्य पढ़े लिखे लोगों या फिर तकनीकी साक्षरों को भी समझ नहीं आता। टेलीविजन का मास्टर शब्द, मास्टर भ्रम फैला देता है।
टेलीविजन की वजह से क्षेत्रीय बोलियों का महत्व भी कम होता जा रहा है। टीवी पर प्रस्तोता जो भाषा बोलता है, ऐसा लगता है कि वही राष्ट्रीय भाषा है। क्षेत्रीय बोली बोलने वालों को अपराध बोध लगता है कि वो अभी भी क्षेत्रीय बोली बोल रहे हैं।

क्षेत्रीय बोलियां लुप्त होती जा रही हैं। खड़ी बोली हिंदी भी विशुद्ध नहीं रह गई है। हिंदी न्यूज चैनलों में पूरी तरह से हिंगलिश चल रहा है। अब तो वही टेलीविजन भाषा मास्टर भाषा बनती जा रही है। पहले साहित्यिक शब्द प्रबुद्ध होने की पहचान देते थे पर अब तो सबकुछ गायब होता जा रहा है।
जिसे पहले साहित्यिक भाषा कहा जाता था अब तो भाषा के गड़बड़ाइजेशन की वजह से लुप्त होती जा रही है। भावों को वहन करने वाले अच्छे शब्द गायब होते जा रहे हैं। क्षेत्रीय शब्द लुप्त हो रहे हैं। कहने को हिंदी प्रगति पर है पर हिंदी प्रगति पर नहीं बल्कि हिंदी, इंगलिश का चोला ओढ़ने को मजबूर है। इसके लिए जिम्मेदार मीडिया ही है।
पहले जो लोग मीडिया में आते थे भाषा और विषय सम्बंधी ज्ञान से सम्पन्न होते थे। समाचार पत्रों के सम्पादक बड़े विद्वान होते थे। परन्तु अब संपादक के पद पर कारोबारी बैठ गए हैं और उनके मातहत काम करने वाले उसके कारोबार को बढ़ाने वाले लेबर। ऐसा जब तक चलता रहेगा भाषा के परिष्कृत होने की संभावना कम ही है।
 





गुरुवार, 21 अगस्त 2014

         संकट की घड़ी में सुंदरकांड पढ़े कांग्रेस!

रामचरित मानस के सुंदरकांड में एक दोहा है तात चरण गहि मागऊँ, राखहुं मोर दुलार।  सीता देहु राम कहु अहित ने होतु तुम्हार।।  जिसमें विभीषण अपने बड़े भाई रावण से कहते हैं- भ्राताश्री मैं आपकी चरण पड़ता हूं। मुझे भरोसा है आप छोटे भाई की बात पर गौर करेंगे। मैं कहूंगा कि सीता जी को प्रभु राम को सौंप दें इसमें आपका कोई अहति नहीं होगा। इतना सुनते ही रावण क्रोध से भर गया और उसने विभीषण को लात से मारा और भाग जाने को कहा।

यह दोहा अचानक याद आ गया। इस दोहे का निहितार्थ कांग्रेस पार्टी के वर्तमान परिदृश्य पर बिल्कुल फिट बैठता है। लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद पार्टी को शुभ सलाह देने वाले पंजाब से पूर्व सांसद जगमीत सिंह बराड़, हरियाणा से चौधरी बीरेंद्र सिंह, राजस्थान से मकसूद अली को पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है। 
लोकसभा चुनाव में पार्टी को मुंह की खाने के बाद राहुल गांधी के नेतृत्व क्षमता का मजाक विपक्षी पार्टियों ने खूब बनाया। पार्टी के भीतर भी सवाल उठे कि चुनाव में हार राहुल गांधी के लचर नेतृत्व की वजह से हुई है। कांग्रेस को चाहिए था कि चुनाव के बाद पार्टी नेताओं से राय लेती, पार्टी कार्यकर्ताओं से सुझाव मांगती। पर ऐसा उसने कुछ नहीं किया जो किसी भी लोकतांत्रिक पार्टी के लिए जरूरी होता है।
कांग्रेस ने पार्टी के सबसे कथित ईमानदार ए. के. एंटनी की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई ताकि हार के कारणों की सही समीक्षा हो सके। कमेटी ने ठीक आजादी के दिन अपनी रिपोर्ट कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को सौंप दी और राहुल गांधी को सभी आरोपों से बरी और आशंकाओं से मुक्त कर दिया। रिपोर्ट में हार के कारणों में मीडिया को भी जिम्मेदार ठहराया गया है। रिपोर्ट सौंपते के बाद कमेटी के अध्यक्ष ए. के. एंटनी ने कहा- हम लोग सोनिया गांधी और राहुल गांधी के नेतृत्व में फिर संभल जाएंगे।


कांग्रेस की हार, हार की समीक्षा और उसकी रिपोर्ट के बाद रामचरित मानस का सुंदरकांड फिर याद आ रहा है। उसमें एक चौपाई है सचिव, वैद, गुरु तीनि जौ प्रिय बोलहिं भय आस। राज - धर्म - तन तीनि कर होई बेगिहीं नास।। अर्थात् यदि कोई सचिव अपने राजा से झूठ बोलता है तो राजा का नास संभव है। यदि धर्म की शिक्षा देने वाला गुरु झूठ बोलता है तो धर्म नष्ट होना तय है और यदि इलाज करने वाला वैद्य झूठ बोलता है तो तन कभी भी स्वस्थ नहीं हो सकता।  
अच्छे प्रशंसक की हमेशा जरूरत पड़ती है और सच्चे आलोचक की भी। कहा भी जाता है - "निंदक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाए बिन साबुन पानी बिना निर्मल करत सुभाय।" ऐसा लगता है कांग्रेस की सच्ची प्रशंसा करने वाला कोई बचा नहीं है और वह निंदकों की बातों को ज्यादा तवज्जों देने के मूड में नहीं है। इन दोनों ही स्थितियों में वह फेल है। अब बचे तीसरे स्तर के दोयम दर्जे के लोग जिन्हें चापलूस या चमचों की संज्ञा दी जाती है। जो अपने मालिक को कभी भी उसकी गलतियों से अवगत नहीं कराते। गलत काम में भी उनकी प्रशंसा करते रहते हैं। यदि कोई सच्ची आलोचना करे तो उसे पार्टी लाइन के खिलाफ बताकर बाहर का रास्ता दिखाने में पार्टी मुखिया का भरपूर सहयोग करते हैं। जैसा कि पिछले दिनों हुआ कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने राहुल गांधी के नेतृत्व की आलोचना की तो उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

कांग्रेस पार्टी की स्थिति विनास काले विपरीत बुद्धि वाली हो गई है। संकट की घड़ी में कांग्रेस को सुझाव यही है दिया जा सकता है कि वह सुंदरकांड का भावार्थ सहित पाठ करे। पूरा विश्वास है वह एक दिन फिर से खड़ी हो जाएगी। नेता और नीतियां सही हों तो कोई भी पार्टी खत्म नहीं हो सकती। बीजेपी भले ही खत्म कर देने की कसमे खा रही हो।




मोदी सिर्फ अच्छे इंसान बनकर न रह जाएं!


पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का लाल किले से दिया भाषण बरबस याद आ जाता है। मनमोहन सिंह का जिक्र इसलिए कर रहा हूं क्योंकि मनमोहन सिंह के दौर से ही लाल किले से किसी पीएम के भाषण को गंभीरता से सुनने लगा हूँ। लोगों ने भी कहा कि लाल किले से दिए गए भाषणों में सच्चाई होती है और सरकार उसे जरूर पूरा करती है। जब यूपीए प्रथम सत्ता में आई तो मनमोहन सिंह ने लाल किले से ऐलान किया था कि अगले पांच साल में पूरा भारत बिजली से रौशन होगा। उसके बाद हर साल 15 अगस्त पर इस बात को दोहराते रहे। जब भी घोषणा करते तो अगले पांच साल में हर घर में बिजली देने के वादा जरूर कर देते। सच्चाई क्या है सबको पता है। आजादी के 67 साल बाद भी सैकड़ों ऐसे गांव हैं जहां अभी भी बिजली नहीं है। यूपीए सरकार की करीब-करीब सारी घोषणाओं का यही नतीजा रहा है। ऊपर से अरबों रुपये के घोटालों ने देश का जो बंटाधार किया वो अलग से।

अब बात करते हैं एनडीए के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाल किले से 15 अगस्त को दिए भाषण की। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि वे वही वादा करते हैं जिसे वे पूरा कर सकें। इसलिए उन्होंने सिर्फ दो घोषणाएं कि पहली जन धन योजना और दूसरी योजना आयोग को खत्म कर नया संस्थान खड़ा करने की। इसके अलावा उन्होंने कोई घोषणा नहीं कि बल्कि सांसदों, कॉर्पोरेट घरानों, राज्य सरकारों से अपील की कि वे स्कूलों में टॉयलट बनवाएं, अपने-अपने क्षेत्र में कम से कम एक आदर्श गांव तैयार करें। देश के युवाओं से आह्वान किया कि कुछ नया निर्मित करें जो जीरो डिफेक्ट, जीरो इफेक्ट वाला हो, जिसे निर्यात कर सकें। विदेशी कंपनियों से आह्वान किया किया कम, मेक इन इंडिया अर्थात् भारत में आओ और यहीं कुछ बनाओ और यहां बनाकर बाकी दुनिया में बेचो। इन बातों से तो साफ है सड़क, बिजली, पानी देश के हर हिस्से में उपलब्ध कराना उनके एजेंडे में नहीं है। दूसरे शब्दों में कहें कि वह इन सबको पूरा कर पाने में अभी असमर्थ हैं।

वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे तो उनके शासन काल में गुजरात में दंगे हुए, उनके शासन काल में कई फर्जी एनकाउंटर हुए। वे राज्य के मुखिया थे इसलिए उन पर आरोप लगने स्वभाविक हैं। परोक्ष-अपरोक्ष रूप से यह सब कुछ कराने के पीछे विपक्षी पार्टियां उन्हें ही कटघरे में खड़ा करती रही हैं। प्रधानमंत्री बनने से एक दिन पहले तक ये आरोप उनका पीछा कर रहे थे। अब जब देश के मुखिया हैं तो उनकी ये बातें ज्यादातर लोगों को पच नहीं पा रही हैं कि साम्प्रदायिक दंगों से कुछ हासिल नहीं हुआ है। उन्होंने अपील करते हुए कहा कि अगले दस साल तक यह सब भूल कर देश के विकास में योगदान दें।
उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 2019 में होने वाली 150वीं जयंती पर देश को साफ सुथरा करने के लिए लोगों से संकल्प लेने को कहा। मां-बाप से कहा कि वे अपने बेटों से भी पूछें कि वह कहां जाते हैं, किससे मिलते  हैं, उनके दोस्त कौन हैं? डॉक्टरों से कहा कि वे अपनी तिजोरी भरने के लिए गर्भ में बेटियों की हत्या ना करें।
ऊपर की दोनों घोषणाओं को छोड़ दें तो बाकी सारी अपील एक प्रवचन की तरह है। हां, यदि इस प्रवचन का असर लोगों पर हो जाए तो जरूर चमत्कार होगा। और लोग इतने सहज और सजग होते तो साधु-संतों का वर्षों से दिया जाने वाला प्रवचन बेकार नहीं जाता। रोज भगवान के मंदिरों में पूजा करने के आतुर लोग पूरे दिन भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं होते।

याद होगा एक बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर कटाक्ष करते हुए दुर्योधन का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि दुर्योधन कहता था कि उसे भी सब पता है कि अच्छाई क्या है, पर उस अच्छाई के प्रति उसकी प्रवृत्ति नहीं है। अर्थात् इस देश के सभी लोगों को पता है कि गर्भ में बेटियों को मारना कानूनन अपराध ही नहीं बल्कि पाप है। इसमें डॉक्टर तो शामिल होते ही हैं परिवार की भी सहमति होती है जो हमारे आपके जैसे होते हैं। उन पर क्या असर पड़ा? क्या ऐसा नहीं लगता ऐसे लोगों से अपील नहीं बल्कि कड़ी से कड़ी सजा देने के प्रावधान की जरूरत है?
नब्बे प्रतिशत लोग अपने घरों की अच्छी सफाई करते हैं पर यहां दूसरों के घरों को गंदा करने, सड़क पर कूड़ा फेकने से खुद को रोकने की बात है। प्रधानमंत्री मोदी की ज्यादातर अपील संस्कारों से जुड़ी है। और आजाद भारत में इसी में सबसे अधिक गिरावट आई है। प्रधानमंत्री देश की सर्वोच्च कुर्सी पर बैठे हैं। कहते हैं ऊंची कुर्सी पर बैठा व्यक्ति कोई बात कहता है तो असर होता है। हम उम्मीद कर सकते हैं कि प्रधानमंत्री की भावनात्मक अपील लोगों के दिलों तक पहुंचेगी और वे खुद को बदलने को मजबूर होंगे। यदि लोग नहीं बदलते हैं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सिर्फ अच्छे इंसान बनकर रह जाएंगे जैसे पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ईमानदार प्रधानमंत्री बनकर रह गए थे।


गुरुवार, 14 अगस्त 2014


सी-सैट विवाद और नासमझ नेता
·        संतोष राय

सी-सैट को लेकर नेताओं के बहकावे में आ गए थे यूपीएससी के प्रतियोगी छात्र। उनसे कहा गया था कि बजट सत्र शुरू होने वाला है, अभी कुछ करोगे तो फायदा है नहीं तो सब बेकार। यही कारण था कि बजट सत्र शुरू होने के साथ ही साथ यूपीएससी छात्रों का आंदोलन शुरू हो गया। संसद में क्षेत्रीय दलों ने जोर शोर से इस मुद्दे को उठाया। संसद में मामले को उठाने वाले सांसदों को भी नहीं पता था कि आखिर मुद्दा है क्या? सरकार को सांसदों की बात से ये लगा जैसे अंग्रेजी बनाम हिंदी समेत अन्य क्षेत्रीय भाषाओं का मामला है। सरकार ने भी एक हफ्ते का समय लिया और कह दिया की ठीक है आठ सवालों वाले अंग्रेजी के प्रश्नों का अंक नहीं जोड़ा जाएगा और जो प्रतियोगी छात्र 2011 में परीक्षा में शामिल हो चुके हैं उन्हें एक और अवसर दिया जाएगा। इन सांसदों ने जैसा संदेश सरकार तक पहुंचाया सरकार ने उसका निराकरण कर दिया। सरकार के फैसले से नाखुश छात्रों ने कहा कि मामला तो ये था ही नहीं? छात्र आंदोलन जारी रखते हुए सी-सैट को ही हटाने की मांग पर अड़े रहे।
सी-सैट को लेकर प्रदर्शन करते यूपीएससी छात्र