मंगलवार, 21 नवंबर 2017

पीड़ित महिलाओं के हिस्से की लड़ाई है ‘अ वुमन अलोन’



दिल्ली स्कूल ऑफ सोशल वर्क डिपार्टमेंट के सभागार में 20 नवंबर 2017 को अ वुमन अलोन’ नाटक का मंचन किया गया। यह नाटक 1997 के साहित्य के नोबल पुरस्कार विजेता इटैलियन नाटककार एवं अभिनेता डारियो फो द्वारा लिखा गया था। इस नाटक में एक स्त्री की पीड़ा को दर्शाया गया है। कहते हैं साहित्य समाज का आईना होता है और अच्छा साहित्य सीमाओं को लांघते हुए सबका सुख-दुख अपने में समेट लेता है। अब इटैलियन नाटकर के नाटक अ वुमन अलोन’ की प्रासंगिकता देखिए कि वह भारतीय समाज का रिफलेक्शन लगता है। इससे एक बात यह भी साबित होती है कि पूरी दुनिया में स्त्रियों को वह सम्मानजनक अधिकार आज भी नहीं मिल पाया हैजिसकी वे वास्तविक हकदार हैं।

पिछले 12 साल से रंगमंच के क्षेत्र में सक्रिय कलाकार शिल्पी मारवाह ने अ वुमन अलोननाटक के जरिये भ्रूण हत्याछेड़छाड़बलात्कारघरेलू हिंसा के खिलाफ महिलाओं को जागरूक करने का बीड़ा उठाया है। दिल्ली विश्वविद्यालय के ज्यादातर कॉलेजों में इस नाटक को वो खेल चुकी हैं और उनका यह अभियान पूरे एनसीआर में चल रहा है।  
अ वुमन अलोन’ एक ऐसी महिला की कहानी है जिसके सपने विवाह के बाद उड़ान नहीं भरते बल्कि घर की चारदीवारी में कैद होकर रह जाते हैं। पति दफ्तर जाता है पर उसे घर में कैद करके जाता है। उस पर शक करता है। बार-बार फोन करके घर में किसी की मौजूदगी भांपता है। घर आने पर उसे प्रताड़ित है। इन सबके बावजूद वह घर में बीमार पड़े देवर की देखभाल करती है। देवर भी मौका पाकर उससे छेड़छाड़ करता है। गर्भवती होने के बावजूद इन सब दबावों को झेलती है। तंग आकर कई बार खुदकुशी की भी कोशिश करती है पर गर्भ में बच्चे का ख्याल आते ही रुक जाती है। उसे डांस करने का शौक है। वह एक डांस टीचर के संपर्क में आती है। लेकिन डांस टीचर उसे प्रेमजाल में फंसा लेता हैउसे धोखा देता है। धीरेधीरे वह टूटती चली जाती है।


भ्रूण हत्याछेड़छाड़बलात्कार और घरेलू हिंसा भारतीय समाज का शर्मनाक हिस्सा बन गया है। महिलाएं सालों से इसे सहती आ रही हैं। समाज बदल रहा है कम से कम इतना हुआ है कि महिलाएं पढ़-लिख रही हैंजागरूक हो रही हैं और इनकी जागरूकता को धार देने के लिए शिल्पी मारवाह जैसी कलाकार दिन रात मेहनत कर रही हैं।
बलात्कार और घरेलू हिंसा जैसी समस्याओं पर जब बात होती है तो ऐसा लगता है कि पुरुष इसके जिम्मेदार हैं जबकि ऐसा नहीं है। भ्रूण हत्याबेटे की चाहत एवं दहेज से जुड़े ज्यादातर मामलों में महिला ही महिला के खिलाफ खड़ी रहती है। महिला सशक्तिकरण का मतलब पुरुष विरोधी नहीं बल्कि महिला भी अपनी सोच को आजाद कर सके – इसकी लड़ाई है।
दिल्ली स्कूल ऑफ सोशल वर्क डिपार्टमेंट के सहयोग से और सुखमंच थियेटर के बैनर तले खेले गए अ वुमन अलोन’ सोलो नाटक में हर बार की तरह इस बार भी शिल्पी मारवाह ने अभिनय कौशल से सबका मन मोह लिया। लोगों को समझदार बनाने का शिल्पी का यहदीवानापन’ लोगों को भी रास आ रहा है। शिल्पी का सफर जारी है...।