महिला अपराध, कौन जिम्मेदार?
· संतोष राय
पिछले दिनों एक संगोष्ठी में शामिल होने का मौका मिला। विषय था महिला
अपराध, घर बाहर की चुनौतियां। इस विषय पर अपना पर्चा पढ़ने वाली महिला
बुद्धिजीवियों की संख्या ज्यादा थी। इनके मुकाबले पुरुष बहुत कम थे। सोचा था
महिलाओं की संख्या ज्यादा है कुछ अनछुए पहलू सामने आएंगे। दुर्भाग्य था कि ज्यादा
से ज्यादा पर्चों में महिलाओं के प्रति होने वाली यौन हिंसा को ही सबसे बड़ा बनाकर
पेश किया गया। यौन हिंसा कब हिंसा है कब नहीं इसके बीच सहमति और असहमति की बहुत
पतली रेखा होती है। यह सहमति और असहमति पर निर्भर है कि उसे कब यौन हिंसा कहा जाए
कब नहीं। पहनावे को लेकर भी चर्चा हुई। मंथन हुआ कि क्या लड़कियों के ड्रेश भी यौन
हिंसा को बढ़ावा देते हैं? महिला बुद्धिजीवियों ने चर्चा के दौरान कहा कि
हां, ड्रेस जिम्मेदार हैं। लेकिन इसके साथ-साथ टेलीविजन, फिल्म और इंटरनेट का भी
बड़ा योगदान है। दूषित मानसिकता का पुरुष इन जगहों से अपने मन को विकृत करता है और
इसका इस्तेमाल बच्चियों एवं बुजुर्गों महिलाओं तक के साथ करने से नहीं हिचकिचाता।
यौन हिंसा को रोकने के लिए जरूरी है टेलीविजन, फिल्म और इंटरनेट से सीधे घरों तक
पहुंचने वाली अश्लीलता को रोकना।
जब हम महिला अपराध की बात करते हैं तो उसमें कन्या भ्रूण हत्या, दहेज
के लिए प्रताड़ना, अपेक्षित संतान की उत्पत्ति न कर पाने पर शारीरिक, मानसिक
प्रताड़ना से लेकर सड़क पर छेड़छाड़ व दफ्तर में बॉस या सीनियर द्वारा मानसिक,
शारीरिक प्रताड़ना शामिल है। इन महिला अपराधों में पचास फीसदी मामलों में पुरुष
वर्ग दोषी नहीं है बल्कि महिला वर्ग दोषी है। जैसे कि कन्या भ्रूण हत्या और दहेज
सम्बंधी मामलों में महिला पर होने वाले अत्याचार के लिए सास और ननद की महत्वपूर्ण
भूमिका रही है। यदि एक बहू को ससुराल पक्ष की महिलाओं द्वारा पर्याप्त प्यार और
स्नेह मिले तो महिलाओं के प्रति होने वाली घरेलू हिंसा नब्बे प्रतिशत तक खत्म हो
सकती है। बाकी जो दस प्रतिशत हिंसा बची है वह ऐसे पुरुषों के कारण है जो या तो
शराबी हैं या फिर स्त्रियों के प्रति किसी घृणा से प्रेरित हैं।
शिक्षित महिलाओं का स्तर बढ़ा है लेकिन पर्याप्त नहीं है। महिलाएं
जैसे-जैसे शिक्षित और सजग होती जाएंगी अपने पर होने वाली किसी भी हिंसा से मुकाबला
करने में सक्षम होंगी। शिक्षा ही उन्हें घर, परिवार और समाज में समानता दिला पाने
में मददगार साबित होगी। अभी भी एक भ्रम बना हुआ है कि पुरुष का तात्पर्य है स्त्री
विरोधी और कमोबेस पुरुष के मन में भी एक भ्रम है कि स्त्री का मतलब पुरुष विरोधी।
एक पुरुष, जो कि आपराधिक मानसिकता का हो सकता है, उसके अपराध करने पर सारे पुरुषों
को भी उसी खांचे में डाल दिया जाता है। ठीक उसी तरह किसी महिला के ऐसे ही किसी
अपराध में शामिल होने के बाद सबको एक साथ ला खड़ा किया जाता है। जबकि ऐसा नहीं है।
जो लोग आपराधिक कामों, या समाज विरोधी कामों में लगे हैं उनकी अलग मानसिकता होती
है। सुखद ये है कि इनकी संख्या बेहद कम है बावजूद इसके सकारात्मक सोच वाले अपने
अनुकूल माहौल नहीं बना पाते। चारों ओर नकारात्मकता का ही माहौल हावी रहता है।
स्त्री-पुरुष में शारीरिक भिन्नता भले हो पर समान अवसर मिले तो दोनों
के बौद्धिक क्षमता में कोई अंतर नहीं है। आज महिलाएं करीब-करीब सभी क्षेत्रों में
अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं। उम्मीद करते हैं कि आने वाले दिनों में इसमें
और इजाफा होगा।
