मोदी
सिर्फ अच्छे इंसान बनकर न रह जाएं!
पूर्व
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का लाल किले से दिया भाषण बरबस याद आ जाता है। मनमोहन
सिंह का जिक्र इसलिए कर रहा हूं क्योंकि मनमोहन सिंह के दौर से ही लाल किले से
किसी पीएम के भाषण को गंभीरता से सुनने लगा हूँ। लोगों ने भी कहा कि लाल किले से
दिए गए भाषणों में सच्चाई होती है और सरकार उसे जरूर पूरा करती है। जब यूपीए प्रथम
सत्ता में आई तो मनमोहन सिंह ने लाल किले से ऐलान किया था कि अगले पांच साल में
पूरा भारत बिजली से रौशन होगा। उसके बाद हर साल 15 अगस्त पर इस बात को दोहराते
रहे। जब भी घोषणा करते तो अगले पांच साल में हर घर में बिजली देने के वादा जरूर कर
देते। सच्चाई क्या है सबको पता है। आजादी के 67 साल बाद भी सैकड़ों ऐसे गांव हैं
जहां अभी भी बिजली नहीं है। यूपीए सरकार की करीब-करीब सारी घोषणाओं का यही नतीजा
रहा है। ऊपर से अरबों रुपये के घोटालों ने देश का जो बंटाधार किया वो अलग से।
अब
बात करते हैं एनडीए के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाल किले से 15 अगस्त को दिए
भाषण की। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि वे वही वादा करते हैं जिसे वे पूरा कर
सकें। इसलिए उन्होंने सिर्फ दो घोषणाएं कि पहली जन धन योजना और दूसरी योजना आयोग
को खत्म कर नया संस्थान खड़ा करने की। इसके अलावा उन्होंने कोई घोषणा नहीं कि
बल्कि सांसदों, कॉर्पोरेट घरानों, राज्य सरकारों से अपील की कि
वे स्कूलों में टॉयलट बनवाएं, अपने-अपने क्षेत्र में कम से कम एक आदर्श गांव तैयार
करें। देश के युवाओं से आह्वान किया कि कुछ नया निर्मित करें जो जीरो डिफेक्ट,
जीरो इफेक्ट वाला हो, जिसे निर्यात कर सकें। विदेशी कंपनियों से आह्वान किया किया ‘कम,
मेक इन इंडिया’
अर्थात् भारत में आओ और यहीं कुछ बनाओ और यहां बनाकर बाकी दुनिया में बेचो। इन
बातों से तो साफ है सड़क, बिजली, पानी देश के हर हिस्से में उपलब्ध कराना उनके
एजेंडे में नहीं है। दूसरे शब्दों में कहें कि वह इन सबको पूरा कर पाने में अभी
असमर्थ हैं।
वर्तमान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे तो उनके शासन काल
में गुजरात में दंगे हुए, उनके शासन काल में कई फर्जी एनकाउंटर हुए। वे राज्य के
मुखिया थे इसलिए उन पर आरोप लगने स्वभाविक हैं। परोक्ष-अपरोक्ष रूप से यह सब कुछ
कराने के पीछे विपक्षी पार्टियां उन्हें ही कटघरे में खड़ा करती रही हैं।
प्रधानमंत्री बनने से एक दिन पहले तक ये आरोप उनका पीछा कर रहे थे। अब जब देश के
मुखिया हैं तो उनकी ये बातें ज्यादातर लोगों को पच नहीं पा रही हैं कि
साम्प्रदायिक दंगों से कुछ हासिल नहीं हुआ है। उन्होंने अपील करते हुए कहा कि अगले
दस साल तक यह सब भूल कर देश के विकास में योगदान दें।
उन्होंने
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 2019 में होने वाली 150वीं जयंती पर देश को साफ
सुथरा करने के लिए लोगों से संकल्प लेने को कहा। मां-बाप से कहा कि वे अपने बेटों
से भी पूछें कि वह कहां जाते हैं, किससे मिलते
हैं, उनके दोस्त कौन हैं? डॉक्टरों से कहा कि वे अपनी तिजोरी भरने
के लिए गर्भ में बेटियों की हत्या ना करें।
ऊपर
की दोनों घोषणाओं को छोड़ दें तो बाकी सारी अपील एक प्रवचन की तरह है। हां, यदि इस
प्रवचन का असर लोगों पर हो जाए तो जरूर चमत्कार होगा। और लोग इतने सहज और सजग होते
तो साधु-संतों का वर्षों से दिया जाने वाला प्रवचन बेकार नहीं जाता। रोज भगवान के
मंदिरों में पूजा करने के आतुर लोग पूरे दिन भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं होते।
याद
होगा एक बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर कटाक्ष करते हुए दुर्योधन
का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि दुर्योधन कहता था कि उसे भी सब पता है कि
अच्छाई क्या है, पर उस अच्छाई के प्रति उसकी प्रवृत्ति नहीं है। अर्थात् इस देश के
सभी लोगों को पता है कि गर्भ में बेटियों को मारना कानूनन अपराध ही नहीं बल्कि पाप
है। इसमें डॉक्टर तो शामिल होते ही हैं परिवार की भी सहमति होती है जो हमारे आपके
जैसे होते हैं। उन पर क्या असर पड़ा? क्या ऐसा नहीं लगता ऐसे लोगों से अपील
नहीं बल्कि कड़ी से कड़ी सजा देने के प्रावधान की जरूरत है?
नब्बे
प्रतिशत लोग अपने घरों की अच्छी सफाई करते हैं पर यहां दूसरों के घरों को गंदा
करने, सड़क पर कूड़ा फेकने से खुद को रोकने की बात है। प्रधानमंत्री मोदी की
ज्यादातर अपील संस्कारों से जुड़ी है। और आजाद भारत में इसी में सबसे अधिक गिरावट
आई है। प्रधानमंत्री देश की सर्वोच्च कुर्सी पर बैठे हैं। कहते हैं ऊंची कुर्सी पर
बैठा व्यक्ति कोई बात कहता है तो असर होता है। हम उम्मीद कर सकते हैं कि प्रधानमंत्री
की भावनात्मक अपील लोगों के दिलों तक पहुंचेगी और वे खुद को बदलने को मजबूर होंगे।
यदि लोग नहीं बदलते हैं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सिर्फ अच्छे इंसान बनकर रह
जाएंगे जैसे पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ईमानदार प्रधानमंत्री बनकर रह गए थे।



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