गुरु की शिकायत!
किसी पर श्रद्धा प्रकट करते करते उसे पूजने लगना बड़ा घातक होता
है। ऐसा करके हम न सिर्फ अपने सीखने के दरवाजे बंद कर लेते हैं बल्कि उसे भी खत्म
कर देते हैं जो पूज्य है। जिनके प्रति मेरा निर्बाध प्रेम व अटूट श्रद्धा है उसकी
शिकायतें बहुत हैं। मैं उसकी शिकायतें करूँगा।
पिछले दिनों जब मैं हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार विश्वनाथ
त्रिपाठी जी के पास गया तो उन्होंने कवि व आलोचक राजेंद्र कुमार के संदर्भ में कई
बातें कहीं। साथ-साथ इलाहाबाद में बिताये दिनों का जिक्र किया। यह भी बताया कि जब
भी वे दिल्ली आते हैं मुझसे मिलने जरूर आते हैं। इन मुलाकातों का कई बार गवाह मैं
भी बना हूँ। दोनों पुराने दिनों की यादों में खो जाते और फिर ठहाके लगाकर हँस
पड़ते। मैं चुपचाप इस ‘दृश्य ग्रंथ’ को देखता रहता। मुझे लगता जैसे कोई ज्ञान की
गंगा बह रही हो और मैं उसमें डुबकी लगा रहा हूँ।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान जब मैं पहली बार
राजेंद्र कुमार के लेक्चर सुना तो मुरीद हो गया। पढ़ाने व समझाने की अद्भुत कला।
ऐसा लगा कि जैसे मुझे मेरा गुरु मिल गया हो। पर इतने बड़े व्यक्तित्व जिनकी
कक्षाओं को प्रतियोगी छात्र भी चोरी छुपे रिस्क लेकर घुस जाते - काफी मना करने के
बाद भी ढीठ की तरह खड़े रहकर भी उन्हें सुनने को तैयार रहते, ऐसे व्यक्तिव के पास
जाने की भी मेरी हिम्मत नहीं थी। पर मेरे सीखने की ललक ने मुझे उनके पास तक पहुंचा
दिया। आज जो मैं सामाजिक रूप से गढ़ा हुआ दिख रहा हूँ उसमें इस कारीगर का सबसे
बड़ा रोल है। फिर क्या था इलाहाबाद की कई गोष्ठियों में शामिल होने हम दोनों
साइकिल से चले जाते और लौट आते थे।
नौकरी की तलाश में जब दिल्ली आया तो राजेंद्र कुमार से करीब
साल भर तक बातचीत नहीं हुई। बड़ा संकोच होता है संघर्षों के दौरान किसी से मिलना,
उससे बात करना। चुपचाप हो गया था। सुबह नौकरी की तलाश में निकलना और कई बार बिना
नींद आए पूरी रात गुजार देना। राजेंद्र कुमार ने बताया कि जब तुम्हारा फोन कई दिन
तक नहीं आया तो मुझे लगा तुम भी वैसे ही हो गए होगे जैसा कि बहुत लोग नौकरी मिल
जाने के बाद हो जाते हैं। लगा तुम्हें भी नौकरी मिल गई होगी और तुम अपने में
व्यस्त हो गए होगे। पर अगले ही क्षण मुझे यह भी विचार आया कि कहीं तुम किसी
परेशानी में तो नहीं, कहीं कोई दिक्कत तो नहीं? राजेंद्र कुमार का फोन आया तो दूसरी
वाली बात सच निकली। उनसे ही मैंने सीखा कि कभी भी एक पक्षीय मत सोचो। कई बार दूसरा
पक्ष ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।
राजेंद्र कुमार जब भी दिल्ली आते होटलों, गेस्ट हाउसों को
तिलांजिल देकर मेरे पास ही रुकते। उस समय मैं एक कमरे के मकान में रहता था। खुद
रोटी सेंकता, सब्जी बनाता और फिर चाव से दोनों बैठकर खाते। जिस कार्यक्रम में
उन्हें जाना होता उन्हें लेकर वहाँ जाता।
विश्वनाथ त्रिपाठी जी से मैने कहा कि जिस राजेंद्र कुमार की आप इतनी तारीफ कर
रहे हैं मेरे पास उनकी शिकायत भी है। उन्होंने कहा- बताओ। मैंने कहा कि - कोई गुरु
ऐसा हो सकता है क्या कि जब-जब राजेंद्र कुमार
दिल्ली आए मुझे जरूर बताया पर जब वे एम्स में हफ्ते भर तक भर्ती रहे मुझे बताना भी
उचित नहीं समझा, और जब मैंने उनसे पूछा कि उन्होंने ऐसा क्यों
किया तो उन्होंने कहा – “मैंने इसलिए नहीं
बताया कि तुम परेशान होते।“

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