हम विकसित हो रहे हैं, पर
कहाँ जा रहे हैं?
हम दो संस्सारों से मिलकर बने हैं एक संस्सार बाहरी है और दूसरा भीतरी। हमारी ज्यादातर
कोशिश बाहरी संस्सार को बेहतर और बेहतर बनाने की होती है - जैसे एक अच्छा घर हो,
एक अच्छी गाड़ी हो, एक सुंदर पत्नी हो, एक दो सुंदर बच्चे हों, ज्यादा से ज्यादा
पैसे आने के स्रोत हों और फिर उस पैसे से कुछ भी खरीद लेने का भरोसा हो – हम पूरा
जीवन इसी तरह के विकास की चाह में तो खपाते हैं?
दूसरा संस्सार है हमारा भीतरी जीवन। इसके डेवलपेंट के लिए हम कुछ नहीं करते।
जो थोड़ा बहुत कर्मकांड करते हैं – ईश्वर की शरण में जाते हैं – दान पूण्य का काम
करते हैं वो सब भी पहले वाले संस्सार को और मजबूत करने के लिए करते हैं। हम मंदिर
में – मस्जिद में – गुरुद्वारे में – चर्च में इसलिए कभी नहीं जाते कि – “हे ईश्वर पिछले
दिनों मुझसे कई गलतियाँ हो गईं थीं (यह तय है गलतियाँ हुई ही होती हैं) – मुझे माफ
करना – आगे से कोई गलती नहीं करूँगा। गीता – कुरान- बाइबल में जिन नैतिक मूल्यों
का उल्लेख है उसको अमल में लाऊंगा। “ हमारी पूरी कोशिश हमारा पूरा कर्मकांड ऊपर वाले संस्कार को
और बड़ा और समृद्ध करने के लिए ही होते हैं। किसी ने बताया कि हवन करवा लो तो
ज्यादा पैसे आने के स्रोत खुल जाएंगे – फलाँ अंगूठी पहन लो तो घर गाडी बंगले के
होने की संभावना बढ़ जाएगी। फलाँ देवता के दर्शन कर लो तो जीवन में कभी कष्ट नहीं
आएंगे। हम कहाँ मानने वाले?
भीतरी संस्सार को परिस्कृत और परिमार्जित करने के लिए न तो अब घरों में बताया
जाता है और न स्कूलों में सिखाया जाता है। अब तो हम में से ज्यादातर लोगों का
सिद्धांत बन गया है कि पैसा है तो सबकुछ है। इसलिए पैसे कमाओ जितना ज्यादा से
ज्यादा हो सके। मुझे तो इतिहास में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला जिसे हम उसके
ज्यादा से ज्यादा पैसे होने की वजह से जानते हैं - बल्कि इसलिए जानते हैं - याद करते हैं - उसका
अनुसरण करते हें कि उसका भीतरी संस्सार बहुत समृद्ध था - परिस्कृत था - सुंदर था -
नैतिक था - शुभ था।
यह सच है कि काल्पनिक धर्मग्रंथों में उल्लेखित कुछ दुनियाओं को अगर दरकिनार
कर दें तो मुझे नहीं लगता बाहरी संस्सार के विकास के लिहाज से इतना डेवलप्ड
संस्सार कभी रहा होगा। आप जरा नजर दौड़ाइयेगा आज हमारे पास-पास वो सब चीजें हैं मौजूद
हैं जो कुछ साल पहले तक लोगों के लिए सपना हुआ करती थीं। सच ये भी है कि हमारा
बाहरी संस्सार समृद्ध पर समृद्ध होता जा रहा है और आंतरिक संस्सार उतना ही जर्जर
और विपन्न। हम सब पिछड़ जाने के भय से विकसित हो जाना चाहते हैं – एक दूसरे से आगे
बढ़ जाना चाहते हैं - हम सबको लग रहा होगा कि हम ऊपर की तरफ बढ़ रहे हैं पर दरअसल
हम नीचे की तरफ जा रहे हैं। मुझे लगता है समय के साथ-साथ जिस जीवन में प्रेम का विस्तार
होते जाना चाहिए था उसमें से प्रेम नदारद होता जा रहा है।
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