सोमवार, 3 जनवरी 2011

‘लाल’ का काला सच





मुझे याद है कुछ साल पहले बिहार के किसी जिले से खबर आई थी कि पुलिस ने एक नक्सली को हथियारों के साथ पकड़ा है। पुलिस की गिरफ्त में आया नक्सली मीडिया को बता रहा था-अमीर लोग गरीबों का शोषण करते हैं, पुलिस वाले अमीरों की मदद करते हैं। सरकार के पास गरीबों के लिए कोई हमदर्दी नहीं है। नियम और कानून सब गरीब लोगों के लिए है। ये दुनिया पैसे वालों की है। बलि का बकरा हमेशा गरीब बनता है–ऐसी ही बहुत की सी बातें उस नक्सली ने कही। उसकी बात से मैं पूरी तरह सहमत हुआ औऱ कई दिन तक इस मुद्दे पर लोगों से बहस करता रहा है कि नक्सलियों की लड़ाई सही है और हम सब को उनका साथ देना चाहिए। मैंने सोचा आखिर कौन नहीं चाहता है कि समाज में समरसता की भावना कायम हो। हरेक को अपने

अधिकारों के साथ जीने का हक मिले। सोचने और जीने की आजादी मिले।

अगर आप आम इंसान हैं तो सोचिये हर दिन जिंदगी जीने के लिए कितनी जद्दोजहद करनी पड़ती है। बिना घूस दिये कोई काम नहीं होता। छोटे दफ्तर के बाबू से लेकर बड़े दफ्तर के अफसर तक घूस लेते हैं। बिना इलाज के हजारों लोग रोज बेमौत मारे जाते हैं क्योंकि पर्याप्त इलाज के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं अगर हैं तो कुछ लोगों के लिए। उद्योग धंधों में लगे मजदूरों को जबरदस्त तरीके से शोषण होता है। समय पर वेतन नहीं दिया जाता। शिक्षा के नाम पर सरकारी प्रचार प्रसार भोथरे साबित हो रहे हैं। प्राइमरी स्कूलों में पैसे वालों के बच्चे अब नहीं पढ़ते। वहीं लोग जाते हैं जो गरीब हैं-वो भी पढ़ाई के लिए नहीं बल्कि मिडडे मील के लिए। आखिर खाएंगे नहीं तो जीएंगे कैसे। यदि इन्हीं सब विसंगतियों और विडंबनाओं के बीच कोई रास्ता सूझता है कि समाज की गैरबराबरी को कम करने के लिए कुछ किया जाए तो मुझे उस नक्सली की सोच ठीक लगती है। मैं ही क्या देश के तमाम लोग उसका समर्थन करेंगे।

धीरे-धीरे जैसे मैं बड़ा होता गया नक्सली गतिविधियों को अपनी आंखों से देखता गया-मुझे वितृष्णा होने लगी। नक्सली ग्रामीणों की हत्या करने लगे, ग्रामीण इलाकों के स्कूलों को तबाह करने लगे। ट्रेनों में लूटपाट करने लगे और अब जो सबसे घिनौनी तस्वीर मेरे सामने आई कि नक्सली आदिवासी महिलाओं को अगवा कर उनका शौन शोषण करते हैं। एक दो नहीं बल्कि हर साल सैकड़ों महिलाएं उनका शिकार होती हैं। आदिवासी हैं, अशिक्षित हैं, गरीब हैं- अत: उन्हें ये समझ नहीं कि उनके गर्भ में जो बच्चा है उसका करें क्या? ऐसी बिन ब्याही मांएं अपने नवजात बच्चों को जंगलों-झाड़ियों में फेंक देती हैं। ये आदिवासी महिलाएं नक्सलियों के हवस का शिकार बन रही हैं। इस कहानी को मुझे कोई और सुनाता तो शायद मैं विश्वास नहीं करता और उल्टे जवाब देता कि आप लोग नक्सलियों की छवि को बिगाड़ना चाहते हैं। लेकिन जब ये हकीकत खुद देखी औऱ सुनी तो पैर के नीचे से जमीन खिसक गई। रांची में एक समाजसेवी संस्था नक्सलियों की शिकार आदिवासी महिलाओं और उनके बच्चों को अपने पास रखती है। इनमें कई बच्चे तो आसपास के जंगली इलाकों लावारिस हालत में थे- उठाकर लाए गए।

ये सब देख सुनकर चिंता इस बात की हुई कि अब भरोसा किसपर करें?


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