रविवार, 2 जनवरी 2011

नया साल है, कुछ नया करो !

पिता जी चाहते थे कि मैं डॉक्टर बनूं । ग्रामीण परिवेश से आने वाले ज्यादातर लोगों के मां-बाप यही सोचते हैं। आप क्या करना चाहते हैं यह कोई नहीं पूछता। आपको बड़े होकर क्या बनना है आपके गार्जियन निर्णय लेते हैं। यही मेरे साथ हुआ-साइंस पढ़ने के लिए दबाव डाला गया। हाईस्कूल, इंटरमीडियट किसी तरह पास कर पाया। पिता जी की नजर में निकम्मा हो गया था। मैं डॉक्टर बनने की हिम्मत हार चुका था लेकिन पिता जी को पूरा भरोसा था कि उनका बेटा डॉक्टर बन जाएगा। साल भर पैसा और समय बर्बाद करने के बाद पिता जी को लंबा सा लेटर लिखा जिसका निहितार्थ यही था कि –मैं डॉक्टर नहीं बन पाउंगा आप जबरदस्ती दबाव डाल रहे हैं। पिता जी को बुरा लगा। क्योंकि संस्कृति यही है कि मां-बाप की आज्ञा का पालन करो। मेरे लंबे पत्र के जवाब में पिता जी का छोटा सा जवाब आया-भाड़ में जाओ। जो मन में आये, करो। जब तक पढ़ोगे पैसा दे दूंगा। तब से लेकर खुद के विवेक का उपयोग करने लगा। शादी भी अपने निर्णय से की। करियर जो चुना -संतुष्ट हूं।

करियर के बाद संस्कार की बात करें-जब छोटा था-दादा-दादी, मम्मी-पापा सभी कहते थे कि सच बोलो। सही काम करो। स्कूल और कॉलेज में गया तो वहां भी इसी तरह के संस्कार देने की कोशिश की गई। बहुत कुछ यही संस्कार आज भी समाहित किए हुए आगे बढ़ रहा हूं। धूम्रपान नहीं करता। दिल्ली में करीब छह साल से रह रहा हूं शराब को हाथ नहीं लगाया। गुटखा-पान सुपाड़ी से कोसों दूर। ऑफिस में एक कर्मठ कर्मचारी की तरह काम करता हूं। ऑफिस में थोड़ा वक्त ज्यादा देना पड़े कोई गम नहीं लेकिन शिफ्ट पूरी होने के बाद काम की संतुष्टि मिले ऐसी कोशिश बराबर करता हूं। वक्त से पहले ऑफिस जाना और तय समय से थोड़ा देर से निकलना-जैसे आदत में शुमार हो गया है। हर आधे घंटे में सिगरेट पीने की आदत नहीं बनी है। एक-एक घंटे में चाय की चुस्कियां लेते हुए इधर की बात उधर करने की लत नहीं पड़ी। ऑफिस में कुछ अच्छे लोग भी हैं-जिन्हें सिर्फ मैं ही अच्छा नहीं कहता बल्कि सभी की नजर में वे अच्छे हैं-मुझे उनका बराबर प्यार मिलता है। मैं इसे अपनी उपलब्धि मानता हूं। अपनी नौकरी से संतुष्ट रहता हूं तो घर का माहौल अच्छा रहता है। रातों को अच्छी नींद आती है। परिवार में भी खुशमय माहौल बना रहता है।

गलत को सही कहना मेरे बस की बात नहीं। मेरे ज्ञान के दायरे में जो कुछ आता है-उस पर तर्क वितर्क कर लेता हूं। अन्यथा बड़ों से सलाह लेना ही उचित समझता हूं। कामचोरों से मेरी सबसे ज्यादा चिढ़ होती है। चापलूसों को बॉस के इर्द-गीर्द काले बादलों की तरह घुमड़ते देखने पर मेरा खून खौलता है।

दो साल तक ईमानदार और सश्रम नौकरी का रिजल्ट मेरे खिलाफ आया। आत्ममंथन किया तो जवाब मिला कि जिन चीजों की मैं खिलाफत करता था वही मेरे लिए घातक सिद्ध हुई। ऑफिस के एक सीनियर मेरे साथ जो हुआ देखकर दुखी थे। उन्होंने मुझे कुछ इन लफ्जों में समझाया- तुम ऑफिस में इतना काम क्यों करते हो? कौन देखता है तुम्हारा काम। तुमने भी आगे पीछे घूमकर झूठे कसीदे गढ़े होते तो आज तुम्हारी ये हालत नहीं होती। तुम लड़की नहीं हो इसलिए तुम्हें कुछ अलग करना होगा, जैसे-शराब की पार्टी दो, जिसमें कमसे कम बॉस जरूर शामिल हो। शराब ऐसी चीज है जो बॉस को भी एकहद तक गिरा सकती है। सर् को फोन कर उनके खिलाफ ऑफिस में चल रही गतिविधियों की जानकारी देते रहो। उन्हें ये आभाष दिलाते रहो कि आप उनके लिए कुछ भी कर सकते हो, जरूरत पड़ी तो थूक कर चाट भी सकते हो। आप उनके करीबियों में से एक बनने की कोशिश करो। काम में बुद्धू और बॉस की नजर में बुद्ध बने रहो। अगर ऐसा करने में सफल रहे तो बॉस जहां भी जाएगा, तुम्हें जरूर ले जाएगा। तरक्की निश्चित है। तुम काम कम राजानीति ज्यादा करो। काम कुछ भी करो, कान इधर-ऊधर लगाए रहो। नया साल है, कुछ नया करो । कुछ पाना है तो शुरू हो जाओ।

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